भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

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[ मित्रलाभः १-५ ] व्याधका जाल फैलाकर चुप बैठना १३ शादागत्य रात्रौ पक्षिणो निवसन्ति । अथ कदाचिदवसन्नायां रात्रावस्ताचलचूडावलम्बिनि भगवति कुमुदिनीनायके चन्द्रमसि लघुपतनकनामा वायसः प्रबुद्धः कृतान्तमिव द्वितीयमायान्तं व्याधमपश्यत् । तमवलोक्याचिन्तयत्—'अद्य प्रातरेवानिष्टदर्शनं जातम् , न जाने किमनभिमतं दर्शयिष्यति ।' इत्युक्त्वा तदनु- सरणक्रमेण व्याकुलश्चलितः । 'गोदावरीके तीरपर एक बड़ा सैमरका पेड़ है । वहां अनेक दिशाओंके देशोंसे आकर रातमें पक्षी बसेरा करते हैं । एक दिन जब थोड़ी रात रह गई और भगवान् कुमुदिनीके नायक चन्द्रमाने अस्ताचलकी चोटीकी शरण ली तब लघुपतनक नामक काग जगा और सामनेसे दूसरे यमराजके समान एक बहेलिएको आते हुए देखा; उसको देखकर सोचने लगा-कि 'आज प्रातःकालही बुरेका मुख देखा है । मैं नहीं जानता हूं कि क्या बुराई दिखावेगा ।' यह कहकर उसके पीछे पीछे घबराकर चल पड़ा । यतः,— शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥ ३ ॥ क्योंकि—सहस्रों शोककी और सैकड़ों भयकी बातें मूर्ख पुरुषको दिन पर दिन दुःख देती हैं और पण्डितको नहीं ॥ ३ ॥ अन्यच्च, विषयिणामिदमवश्यं कर्तव्यम्,— और दूसरे-संसारके धंधोंमें लगे हुए मनुष्योंको यह अवश्य करना चाहिये कि— उत्थायोत्थाय बोद्धव्यं महद्भयमुपस्थितम् । मरणव्याधिशोकानां किमद्य निपतिष्यति ॥ ४ ॥ नित्य उठतेही बड़ा भय आया ( आनेका संभव है ) ऐसा समझ लेना चाहिये, क्योंकि मरण आपत्ति और शोक, इनमेंसे न जाने कौनसा भी आ पड़े ॥ ४ ॥ अथ तेन व्याधेन तण्डुलकणान्विकीर्य जालं विस्तीर्णम् । स च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः । तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपो- तराजः सपरिवारो वियति विसर्पंस्तांस्तण्डुलकणानवलोक्या-