हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 32, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंहितोपदेशः • मित्रलाभः अथ प्रासादपृष्ठे सुखोपविष्टानां राजपुत्राणां पुरस्तात्प्रस्ताव- क्रमेण स पण्डितोऽब्रवीत्— फिर राजभवनके ऊपर आनन्दसे बैठे हुए, राजकुमारोंके सामने प्रसंगकी रीतिसे पंडितजी यों बोले— ‘काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् । व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा’ ॥ १ ॥ ‘काव्यशास्त्रके विनोदसे बुद्धिमानोंका और द्यूत आदि दुर्व्यसन, नींद अथवा कलहसे मूर्खोंका समय कटता है ॥ १ ॥ ‘तद्भवतां विनोदाय काककूर्मादीनां विचित्रां कथां कथयामि ?’ राजपुत्रैरुक्तम्—‘आर्य ! कथ्यताम् ।’ विष्णुशर्मोवाच—‘शृणुत; संप्रति मित्रलाभः प्रस्तूयते । यस्यायमाद्यः श्लोकः— इसलिये आपकी प्रसन्नताके लिये काग, कछुआ आदिकी विचित्र कथा कहताहूं’ । राजपुत्र बोले—‘हे गुरुजी ! कहिये’ । विष्णुशर्मा बोले—‘सुनिये मैं अब मित्रलाभ कहता हूं कि जिसका प्रथम वाक्य यह है— असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्तः सुहृत्तमाः । साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत्’ ॥ २ ॥ अस्त्र शस्त्र आदि उपायरहित, तथा धनहीन किन्तु बुद्धिमान् और आपसमें बड़े परम मित्र ( साथी ) काक, कूर्म, मृग और चूहेके समान शीघ्र कार्योंको सिद्ध कर लेते हैं’ ॥ २ ॥ राजपुत्रा ऊचुः—‘कथमेतत् ?’। विष्णुशर्मा कथयति,— राजपुत्र बोले—‘यह कहानी कैसी है ?’ । विष्णुशर्मा कहने लगे— कथा १ [ काग, कछुआ, मृग और चूहेकी कहानी १ ] ‘अस्ति गोदावरीतीरे विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र नानादिग्दे-