हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ४२- मेरा बन्धन पीछे काटना' । हिरण्यकने भी कहा-'मित्र ! मैं निर्बल हूं, और मेरे दांतभी कोमल हैं, इसलिये इन सबका बंधन काटनेके लिये कैसे समर्थ हूं ? इसलिये जब तक मेरे दांत नहीं टूटेंगे तब तक तुम्हारा फंदा काटता हूं । पीछे इनकेभी बंधन जहां तक कट सकेंगे तब तक काटूंगा' । चित्रग्रीव बोला-'यह ठीक है, तो भी यथाशक्ति पहले इनके काटो' । हिरण्यकने कहा-'अपनेको छोड़ कर अपने आश्रितोंकी रक्षा करना यह नीति जानने वालों(पंडितों)को संमत नहीं है; यतः,— आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान्रक्षेद्धनैरपि । आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ ४२ ॥ क्योंकि—मनुष्यको आपत्तिके लिये धनकी, धन देकर स्त्रीकी, और धन तथा स्त्री देकर अपनी रक्षा सर्वदा करनी चाहिये ॥ ४२ ॥ अन्यच्च,— धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राणाः संस्थितिहेतवः । तान्निघ्नता किं न हतं, रक्षता किं न रक्षितम् ?' ॥ ४३ ॥ और दूसरे—धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष इन चारोंकी रक्षाके लिये प्राण कारण हैं, इसलिये जिसने इन प्राणोंका घात किया उसने क्या घात नहीं किया ? अर्थात् सब कुछ घात किया, और जिसने प्राणोंका रक्षण किया उसने क्या रक्षण न किया ? अर्थात् सबका रक्षण किया ॥ ४३ ॥ चित्रग्रीव उवाच-‘सखे ! नीतिस्तावदीदृश्येव । किं त्वहमस्सदा- श्रितानां दुःखं सोढुं सर्वथाऽसमर्थः । तेनेदं ब्रवीमि । चित्रग्रीव बोला-‘मित्र ! नीति तो ऐसीही है परन्तु मैं अपने आश्रितोंका दुःख सहनेको सब प्रकारसे असमर्थ हूं इस कारण यह कहता हूं. यतः,— धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् । सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥ ४४ ॥ क्योंकि—पण्डितको पराये उपकारके लिये अपना धन और प्राणोंकोभी छोड़ देना चाहिये, क्योंकि विनाश तो अवश्य होगा, इसलिये अच्छे पुरुषोंके लिये प्राण त्यागना अच्छा है ॥ ४४ ॥