भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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-४९ ] साथियोंके लिये चित्रग्रीवकी उदारता २७ अयमपरश्चासाधारणो हेतुः— जातिद्रव्यगुणानां च साम्यमेषां मया सह । मत्प्रभुत्वफलं ब्रूहि कदा किं तद्भविष्यति ॥ ४५ ॥ और दूसरा यहभी एक विशेष कारण है-इन कबूतरोंका और मेरा जाति, द्रव्य और बल समान है, तो मेरी प्रभुताका फल कहो, जो अब न होगा तो किस कालमें और क्या होगा ? ॥ ४५ ॥ अन्यच्च,— विना वर्तनमेवैते न त्यजन्ति ममान्तिकम् । तन्मे प्राणव्ययेनापि जीवयैतान्ममाश्रितान् ॥ ४६ ॥ और दूसरे-आजीविकाके विना भी ये मेरा साथ नहीं छोड़ते हैं, इसलिये प्राणोंके बदलेभी इन मेरे आश्रितोंको जीवदान दो ॥ ४६ ॥ किं च,— मांसमूत्रपुरीषास्थिनिर्मितेऽस्मिन्कलेवरे । विनश्वरे विहायास्थां यशः पालय मित्र ! मे ॥ ४७ ॥ और-हे मित्र ! मांस, मल, मूत्र, तथा हड्डीसे बने हुए इस विनाशी शरीरमें आस्थाको छोड़ कर मेरे यशको बढ़ाओ ॥ ४७ ॥ अपरं च पश्य,— यदि नित्यमनित्येन निर्मलं मलवाहिना । यशः कायेन लभ्येत तन्न लब्धं भवेन्नु किम् ? ॥ ४८ ॥ और भी देखो-जो, अनित्य और मल-मूत्रसे भरे हुए शरीरसे निर्मल और नित्य यश मिले तो क्या नहीं मिला ? अर्थात् सब कुछ मिला ॥ ४८ ॥ यतः,— शरीरस्य गुणानां च दूरमत्यन्तमन्तरम् । शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः' ॥ ४९ ॥ क्योंकि—शरीर तथा दयादि गुणोंमें बड़ा अन्तर है. शरीर तो क्षणभंगुर है, और गुण कल्पके अन्त तक रहने वाले हैं' ॥ ४९ ॥

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