भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

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२८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ५०- इत्याकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन्नब्रवीत्—'साधु मित्र ! साधु । अनेनाश्रितवात्सल्येन त्रैलोक्यस्यापि प्रभुत्वं त्वयि युज्यते' । एवमुक्त्वा तेन सर्वेषां बन्धनानि छिन्नानि । ततो हिर- ण्यकः सर्वान्सादरं संपूज्याह—'सखे चित्रग्रीव ! सर्वथात्र जाल- बन्धनविधौ दोषमाशङ्क्यात्मन्यवज्ञा न कर्तव्या । यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्नचित्त तथा पुलकायमान होकर बोला—'धन्य है, मित्र ! धन्य है । इन आश्रितों पर दया विचारनेसे तो तुम तीनों लोककीही प्रभुताके योग्य हो' । ऐसा कह कर उसने सबका बंधन काट डाला। पीछे हिरण्यक सबका आदर-सत्कार कर बोला-'मित्र चित्रग्रीव ! इस जालबंधनके विषयमें दोष की शंका कर अपनी अवज्ञा नहीं चाहिये । यतः,— योऽधिकायोजनशतात्पश्यतीहामिषं खगः । स एव प्राप्तकालस्तु पाशबन्धं न पश्यति ॥ ५० ॥ क्योंकि—जो पक्षी सैकड़ों योजनसे भी अधिक दूरसे (छोटेसे) अन्नके दानेको या मांसको देखता है वही बुरा समय आनेपर जालकी ( बडी ) गांठको नहीं देखता है ॥ ५० ॥ अपरं च,— शशिदिवाकरयोर्ग्रहपीडनं गजभुजंगमयोरपि बन्धनम् । मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां विधिरहो बलवानिति मे मतिः ॥ ५१ ॥ और दूसरे-चंद्रमा तथा सूर्यको ग्रहणकी पीड़ा, हाथी और सर्पका बंधन, और पण्डितोंकी दरिद्रता, देख कर मेरी तो समझमें यह आता है कि प्रारब्ध ही बलवान् है ॥ ५१ ॥ १ योजन=चार कोश याने ८ मील.