हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें-५३ ] सुहृद्भक्ति देख कर कौएकी प्रीति २९ अन्यच्च,— व्योमैकान्तविहारिणोऽपि विहगाः संप्राप्नुवन्त्यापदं बध्यन्ते निपुणैरगाधसलिलान्मत्स्याः समुद्रादपि । दुर्नीतं किमिहास्ति, किं सुचरितं, कः स्थानलाभे गुणः ? कालो हि व्यसनप्रसारितकरो गृह्णाति दूरादपि'॥ ५२ ॥ और आकाशके एकान्त स्थानमें विहार करने वाले पक्षीभी विपत्तिमें पड़ जाते हैं, और चतुर धीवर मछलियोंको अथाह समुद्रसेभी पकड़ लेते हैं। इस संसारमें दुर्नीति क्या है, और सुनीति क्या है, और विपत्तिरहित स्थानके लाभमें क्या गुण है ? अर्थात् कुछ नहीं है । क्योंकि, काल आपत्तिरूप अपने हाथ फैला कर बैठा है, और समय आने पर दूरहीसे ग्रहण कर (झपट ) लेता है ॥५२॥ इति प्रबोध्यातिथ्यं कृत्वालिङ्ग्य च चित्रग्रीवस्तेन संप्रेषितो यथेष्ट- देशान्सपरिवारो ययौ । हिरण्यकोऽपि खविवरं प्रविष्टः । यों समझा कर और अतिथि सत्कार कर तथा मिल भेटकर उसने चित्रग्रीवको बिदा किया और वह अपने परिवारसमेत अपने देशको गया । हिरण्यक भी अपने बिलमें घुस गया । यानि कानि च मित्राणि कर्तव्यानि शतानि च । पश्य मूषकमित्रेण कपोता मुक्तबन्धनाः ॥ ५३ ॥ कोई हो, मनुष्यको सैकड़ों मित्र बनाने चाहिये । देखो, मूषक मित्रने कबू- तरोंका बंधन काट डाला ॥ ५३ ॥ अथ लघुपतनकनामा काकः सर्ववृत्तान्तदर्शी साश्चर्यमिद- माह—'अहो हिरण्यक ! श्लाघ्योऽसि । अतोऽहमपि त्वया सह मैत्रीमिच्छामि, अतो मां मैत्र्येणानुग्रहीतुमर्हसि' । एतच्छ्रुत्वा हिरण्यकोऽपि विवराभ्यन्तरादाह—'कस्त्वम् ?' । स ब्रूते—'लघु- पतनकनामा वायसोऽहम्' । हिरण्यको विहस्याह—'का त्वया सह मैत्री ? इसके बाद लघुपतनक नाम कौवा ( चित्रग्रीवके बंधन आदि ) सब वृत्तान्तको जानने वाला आश्चर्यसे यह बोला—'हे हिरण्यक ! तुम प्रशंसाके योग्य हो, इस- लिये मैं भी तुम्हारे साथ मित्रता करना चाहता हूं। इसलिये कृपा करके मुझसे भी मित्रता करलो' । यह सुन कर हिरण्यकभी बिलके भीतरसे बोला—'तू कौन है ?