भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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-५६ ] अंधा गिद्ध और बिलाव आदि की कहानी ३१ द्वितीयः ?' । मृगो ब्रूते—'जम्बूकोऽयम् । अस्मत्सख्यमिच्छन्ना- गतः' । काको ब्रूते—'मित्र ! अकस्मादागन्तुना सह मैत्री न युक्ता । मगधदेशमें चम्पकवती नामका एक महान् अरण्य था, उसमें बहुत दिनोंसे मृग और कौवा बड़े स्नेहसे रहते थे । किसी गीदड़ने उस मृगको हट्टाकट्टा और अपनी इच्छासे इधर उधर घूमता हुवा देखा. इसको देख कर गीदड़ सोचने लगा-अरे, कैसे इस सुन्दर (मीठा) मांसको खाऊं ? जो हो, पहले इसे विश्वास उत्पन्न कराऊं । यह विचार कर उसके पास जाकर बोला-'हे मित्र ! तुम कुशल हो ?' मृगने कहा-'तू कौन है?'. वह बोला-'मैं क्षुद्रबुद्धि नामक गीदड़ हूं. इस बनमें बन्धुहीन मरेके समान रहता हूं; और अब तुमसे मित्रको पाकर फिर इस संसारमें बन्धुसहित जी उठा हूं और सब प्रकारसे तुमारा सेवक बन कर रहूंगा' । मृगने कहा-'ऐसाही हो, अर्थात् रहा कर । इसके अनन्तर किरणोंकी मालासे शोभित भगवान् सूर्यके अस्त हो जानेपर वे दोनों मृगके घरको गये और वहां चंपाके वृक्षकी डाल पर मृगका परम मित्र सुबुद्धि नाम कौवा रहता था । कौएने इन दोनोंको देखकर कहा—'मित्र ! यह चितकबरा दूसरा कौन है ?' मृगने कहा—'यह गीदड़ है । हमारे साथ मित्रता करनेकी इच्छासे आया है' । कौवा बोला—'मित्र ! अनायास आए हुएके साथ मित्रता नहीं करनी चाहिये; तथा चोक्तम्,— अज्ञातकुलशीलस्य वासो देयो न कस्यचित् । मार्जारस्य हि दोषेण हतो गृध्रो जरद्गवः ॥ ५६ ॥ कहाभी है कि—जिसका कुल और स्वभाव नहीं जाना है उसको घरमें कभी न ठहराना चाहिये । क्योंकि बिलावके अपराधसे एक बूढा गिद्ध मारा गया ॥५६ तावाहतुः—'कथमेतत् ?' । काकः कथयति— यह सुन वे दोनों बोले—'यह कथा कैसे है ?' कौवा कहने लगा,— कथा ३ [ अंधा गिद्ध, बिलाव और चिडियोंकी कहानी ३ ] अस्ति भागीरथीतीरे गृध्रकूटनाम्नि पर्वते महान्पर्कटीवृक्षः । तस्य कोटरे दैवदुर्विपाकाद्गलितनखनयनो जरद्गवनामा गृध्रः प्रतिवसति । अथ कृपया तज्जीवनाय तद्वृक्षवासिनः पक्षिणः

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