भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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३२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ५७- स्वाहारात्किंचित्किंचिदुद्धृत्य ददति । तेनासौ जीवति । अथ कदाचिद्दीर्घकर्णनामा मार्जारः पक्षिशावकान्भक्षितुं तत्रागतः । ततस्तमायान्तं दृष्ट्वा पक्षिशावकैर्भयातैः कोलाहलः कृतः । तच्छ्रुत्वा जरद्गवेनोक्तम्—'कोऽयमायाति ?'। दीर्घकर्णो गृध्रमव- लोक्य सभयमाह—'हा, हतोऽस्मि' । गंगाजीके किनारे गृध्रकूट नाम पर्वत पर एक बड़ा पाकड़का पेड़ था। उसके खोखलेमें दुर्भाग्यसे एक अंधा तथा नखहीन जरद्गव नामक गिद्ध रहता था, और उस वृक्षके वासी कृपा करके उसके पालनके लिये अपने आहारमेंसे थोड़ा थोड़ा निकाल कर देते थे; उससे वह जीता था। फिर एक दिन दीर्घकर्ण नाम बिलाव पक्षियोंके बच्चे खानेके लिये वहां आया। पीछे उसे आया हुआ देख कर डरसे घबरा कर पक्षियोंके बच्चे चिंहचिंहाने लगे. यह सुन जरद्गवने कहा—'यह कौन आ रहा है?'. दीर्घकर्ण गिद्धको देख डर कर बोला—'हाय, मैं मारा गया.' यतः,— तावद्भयस्य भेतव्यं यावद्भयमनागतम् । आगतं तु भयं वीक्ष्य नरः कुर्याद्यथोचितम् ॥ ५७ ॥ क्योंकि—भयसे तभी तक डरना चाहिये जब तक वह पास न आवे, परन्तु भयको पास आया देख कर मनुष्यको जो उचित हो सो करना चाहिये ॥ ५७ ॥ अधुनास्य संनिधाने पलायितुमक्षमः । तद्यथा भवितव्यं तद्भवतु । तावद्विश्वासमुत्पाद्यास्य समीपं गच्छामि ।' इत्यालोच्योपसृ- त्याब्रवीत्—'आर्य ! त्वामभिवन्दे ।' गृध्रोऽवदत्—'कस्त्वम् ?' । सोऽवदत्—'मार्जारोऽहम्' । गृध्रो ब्रूते—'दूरमपसर । नो चेद्ध- न्तव्योऽसि मया' । मार्जारोऽवदत्—'श्रूयतां तावदस्मद्वचनम् । ततो यद्यहं वध्यस्तदा हन्तव्यः । अब इसके पाससे भाग नहीं सकता हूं, इसलिये जो होनहार है सो हो । पहले विश्वास पैदा कर इसके पास जाऊं । यह विचार उसके पास जाकर बोला—'हे महाराज ! मैं आपको प्रणाम करता हूं'. गिद्ध बोला—'तू कौन है ?'. वह बोला—'मैं बिलाव हूं'. गिद्ध बोला—'दूर हट जा; नहीं तो मैं तुझे मार डालूंगा'. बिलाव बोला—'पहले मेरी बात तो सुन, लो पीछे जो मैं मारनेके योग्य होऊं तो मार डालना ।