भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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३४ हितोपदेशः [मित्रलाभः ६०- यतः,— तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता । एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ ६० ॥ क्यों कि-कुशाका आसन, बैठनेकी भूमि, जल, और चौथी सत्य और मीठी वाणी इनका सज्जनोंके घरमें कभी टोटा नहीं होता है ॥ ६० ॥ अपरं च,— निर्गुणेष्वपि सत्त्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । न हि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनः ॥ ६१ ॥ और दूसरे-सज्जन लोग, गुणहीन प्राणियों परभी दया करते हैं। जैसे चन्द्रमा चाण्डालके घर पर पड़ी चांदनीको नहीं समेट लेता है ॥ ६१ ॥ अन्यच्च,— अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति ॥ ६२ ॥ और जिसके घरसे अतिथि विमुख लौट जाता है, वह अतिथि अपने पापको देकर और उस गृहस्थका पुण्य लेकर चला जाता है ॥ ६२ ॥ अन्यच्च,— उत्तमस्यापि वर्णस्य नीचोऽपि गृहमागतः । पूजनीयो यथायोग्यं सर्वदेवमयोऽतिथिः१ ॥ ६३ ॥ और उत्तम वर्णके घर नीच वर्णकाभी अतिथि आवे तो उसका यथोचित सत्कार करना चाहिये, क्योंकि अतिथि सर्वदेवमय है ॥ ६३ ॥ गृध्रोऽवदत्—'मार्जारो हि मांसरुचिः । पक्षिशावकाश्चात्र निव- सन्ति । तेनाहमेवं ब्रवीमि ।' तच्छ्रुत्वा मार्जारो भूमिं स्पृष्ट्वा कर्णौ स्पृशति । ब्रूते च—'मया धर्मशास्त्रं श्रुत्वा वीतरागेणेदं दुष्करं व्रतं चान्द्रायणमध्यवसितम् । परस्परं विवदमानानामपि धर्मशास्त्रा- णाम् 'अहिंसा परमो धर्मः' इत्यत्रैकमत्यम् । गिद्ध बोला-'बिलावकी मांसमें जरूर रुचि होती है, और यहां पक्षियोंके छोटे २ बच्चे रहते हैं. इसलिये मैं ऐसे कहता हूं'। यह सुन कर बिलावने भूमिको १ कहा है कि, जो फल सब देवताओंकी सेवासे मिलता है वही फल अतिथिकी सेवासे मिलता है ।