हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें-६८ ] बिलावकी चाटुता पर आश्रय दे देना ३५
छूकर कानोंको छुआ, और बोला-‘मैंने धर्मशास्त्र सुन कर और विषयवासनाको छोड़ यह कठिन चान्द्रायण व्रत किया है । आपसमें धर्मशास्त्रोंका विरोध होने परभी “हिंसा न करना यही परम धर्म है” इस मंतव्यमें सब एकमत हैं,— यतः,— सर्वहिंसानिवृत्ता ये नराः सर्वसहाश्च ये । सर्वस्याश्रयभूताश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ६४ ॥ क्योंकि—जो मनुष्य सब प्रकारकी हिंसासे रहित हैं, सब( असह्य )को सहते हैं और सबको सहारा देते हैं वे स्वर्गको जाते हैं ॥ ६४ ॥ एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः । शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यत्तु गच्छति ॥ ६५ ॥ एक धर्मही मित्र है जो मरने परभी ( आत्माके ) साथ जाता है, अन्य सब वस्तु शरीरके साथ ( यहां ) ही नाश हो जाती हैं ॥ ६५ ॥ योऽत्ति यस्य यदा मांसमुभयोः पश्यतान्तरम् । एकस्य क्षणिका प्रीतिरन्यः प्राणैर्विमुच्यते ॥ ६६ ॥ जो प्राणी जिस समय, जिस प्राणिका मांस खाता है उन दोनोंमें अन्तर देखो—एकको तो केवल क्षणभरका संतोष होता है और दूसरा प्राणोंसे जाता है ॥ ६६ ॥ मर्त्तव्यमिति यद्दुःखं पुरुषस्योपजायते । शक्यते नानुमानेन परेण परिवर्णितुम् ॥ ६७ ॥ “मुझे अवश्य मरना होगा” ऐसी चिन्तासे मनुष्यको जो ( प्रत्यक्ष ) दुःख होता है वह दुःख ( केवल ) अनुमानसे दूसरा मनुष्य वर्णन नहीं कर सकता है ॥ ६७ ॥ शृणु पुनः,— स्वच्छन्दवनजातेन शाकेनापि प्रपूर्यते । अस्य दग्धोदरस्यार्थे कः कुर्यात्पातकं महत् ? ॥ ६८ ॥ फिर सुनो–जो पेट अपने आप उगी हुई साग-भाजीसे भी भरा जा सकता है, उस जले पेटके लिये ऐसा बड़ा ( भयंकर ) पाप कौन करे ? ॥ ६८ ॥ एवं विश्वास्य स मार्जारस्तरुकोटरे स्थितः । इस प्रकार विश्वास पैदा कर वह बिलाव वृक्षके खोडरमें रहने लगा । ततो दिनेषु गच्छत्सु पक्षिशावकानाक्रम्य कोटरमानीय प्रत्यहं खादति । येषामपत्यानि खादितानि तैः शोकातैर्विलपद्भिरितस्ततो