हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ७२- यतः,— आपत्सु मित्रं जानीयाद्युद्धे शूरमृणे शुचिम् । भार्याँ क्षीणेषु वित्तेषु व्यसनेषु च बान्धवान् ॥ ७२ ॥ आपत्तिमें मित्र, युद्धमें शूर, उधार(ऋण)में सच्चा व्यवहार, निर्धनतामें स्त्री और दुःखमें भाई ( या कुटुंबी ) परखे जाते हैं ॥ ७२ ॥ अपरं च,— उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे । राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः’ ॥ ७३ ॥ और दूसरे-विवाहादि उत्सवमें, आपत्तिमें, अकालमें, राज्यके पलटनेमें, राज- द्वारमें तथा श्मशानमें, जो साथ रहता है वह बान्धव है' ॥ ७३ ॥ जम्बुको मुहुर्मुहुः पाशं विलोक्याचिन्तयत्—'दृढस्तावदयं बन्धः ।' ब्रूते च—'सखे ! स्नायुनिर्मिता एते पाशाः । तदद्य भट्टारकवारे कथमेतान्दन्तैः स्पृशामि ? मित्र ! यदि चित्ते नान्यथा मन्यसे तदा प्रभाते यत्त्वया वक्तव्यं तत्कर्तव्यम् ।' इत्यु- क्त्वा तत्समीप आत्मानमाच्छाद्य स्थितः सः । अनन्तरं स काकः प्रदोषकाले मृगमनागतमवलोक्येतस्ततोऽन्विष्य तथाविधं दृष्ट्वोवाच—'सखे ! किमेतत् ?' । मृगेणोक्तम्-‘अवधीरितसुहृ- द्वाक्यस्य फलमेतत् । सियार जालको वार वार देख सोचने लगा-‘यह बड़ा कड़ा बंधा है’. और बोला-‘मित्र ! ये फंदे तांतके बने हुए हैं, इसलिये आज रविवारके दिन इन्हें दांतोंसे कैसे छुऊं ? मित्र ! जो बुरा न मानो तो प्रातःकाल जो कहोगे सो करूंगा’। ऐसा कह कर उसके पासही वह अपनेको छिपा कर बैठ गया । पीछे वह कौवा सांझ होने पर मृगको नहीं आया देख कर इधर उधर ढूंढते ढूंढते उस प्रकार उसे ( बंधनमें ) देख कर बोला-‘मित्र ! यह क्या है?'. मृगने कहा-‘मित्रका वचन नहीं माननेका फल है; तथा चोक्तम्,— सुहृदां हितकामानां यः शृणोति न भाषितम् । विपत्सन्निहिता तस्य स नरः शत्रुनन्दनः’ ॥ ७४ ॥