भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

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-७७] सियारको कौवेका हार्दिक धिक्कार ३९ जैसा कहा है कि-जो मनुष्य अपने हितकारी मित्रोंका वचन नहीं सुनता है उसके पासही विपत्ति है, और वह अपने शत्रुओंको प्रसन्न करने वाला है' ॥७४॥ काको ब्रूते—‘स वञ्चकः क्वास्ते ?’ । मृगेणोक्तम्—‘मन्मांसार्थी तिष्ठत्यत्रैव’ । काको ब्रूते—‘उक्तमेव मया पूर्वम्,- कौवा बोला-‘वह ठग कहां है ?’. मृगने कहा-‘मेरे मांसका लोभी यहांही कहाँ बैठा होगा ?’. कौवा बोला-‘मैंने पहलेही कहा था,— अपराधो न मेऽस्तीति नैतद्विश्वासकारणम् । विद्यते हि नृशंसेभ्यो भयं गुणवतामपि ॥ ७५ ॥ ‘मेरा कुछ अपराध नहीं है' अर्थात् मैने इसका कुछ नहीं बिगाड़ा है, अत एव यहभी मेरे संग विश्वासघात न करेगा यह बात कुछ विश्वासका कारण नहीं है। क्योंकि गुण और दोषको बिना सोचे शत्रुता करने वाले नीचोंसे सज्जनोंको अवश्य भय होता ही है ॥ ७५ ॥ दीपनिर्वाणगन्धं च सुहृद्वाक्यमरुन्धतीम् । न जिघ्रन्ति न शृण्वन्ति न पश्यन्ति गतायुषः ॥ ७६ ॥ और जिनकी मृत्यु पास आ लगी है, ऐसे मनुष्य न तो बुझे हुए दियेकी चिरांद सूंघ सकते हैं, न मित्रका वचन सुनते हैं और न अरुन्धतीके तारेको देख सकते हैं ॥ ७६ ॥ परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् । वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्' ॥ ७७ ॥ पीठ पीछे काम बिगाड़ने वाले और मुख पर मीठी २ बातें करने वाले मित्रको, मुखपर दूध वाले विषके घड़ेके समान छोड़ देना चाहिये' ॥ ७७ ॥ ततः काको दीर्घं निःश्वस्य ‘अरे वञ्चक ! किं त्वया पापकर्मणा कृतम् ? कौवेने लंबी सांस भर कर कहा कि-‘अरे ठग ! तुझ पापीने यह क्या किया ? यतः,— संलापितानां मधुरैर्वचोभि- र्मिथ्योपचारैश्च वशीकृतानाम् । १ आकाशमें सप्त ऋषियोंके तारोंके पास एक बहुत छोटासा तारा है ।