हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-८३ ] हरिणकी मुक्तता, सियारकी मृत्यु ४१ और दुष्ट मनुष्यका प्रियवादी होना यह विश्वासका कारण नहीं है । उसकी जीभके आगे मिठास और हृदयमें हालाहल विष भरा है' ॥ ८२ ॥ अथ प्रभाते क्षेत्रपतिर्लगुडहस्तस्तं प्रदेशमागच्छन् काकेनाव- लोकितः । तमालोक्य काकेनोक्तम्—'सखे मृग ! त्वमात्मानं मृतवत्संदर्श्य वातेनोदरं पूरयित्वा पादान्स्तब्धीकृत्य तिष्ठ। यदाहं शब्दं करोमि तदा त्वमुत्थाय सत्वरं पलायिष्यसि।' मृगस्तथैव काकवचनेन स्थितः। ततः क्षेत्रपतिना हर्षोत्फुल्लोचनेन तथा- विधो मृग आलोकितः। 'आः, स्वयं मृतोऽसि' इत्युक्त्वा मृगं बन्धनान्मोचयित्वा पाशान्ग्रहीतुं सयत्नो बभूव । ततः काकशब्दं श्रुत्वा मृगः सत्वरमुत्थाय पलायितः। तमुद्दिश्य तेन क्षेत्रपतिना क्षिप्तेन लगुडेन शृगालो हतः। पीछे प्रातःकाल कौवेने उस खेत वालेको लकडी हाथमें लिये उस स्थान पर आता हुआ देखा. उसे देख कर कौवेने मृगसे कहा—'मित्र हरिण ! तू अपने शरीरको मरेके समान दिखा कर पेटको हवासे फुला कर और पैरोंको ठिठिया कर बैठ जा। जब मैं शब्द करूं तब तू झट उठ कर जल्दी भाग जाना'. मृग उसी प्रकार कौवेके वचनसे पड गया ! फिर खेत वालेने प्रसन्नतासे आंख खोल कर उस मृगको इस प्रकार देखा.'आहा ! यह तो आपही मर गया' ऐसा कह कर मृगकी फांसीको खोल कर जालको समेटनेका यत्न करने लगा. पीछे कौवेका शब्द सुन कर मृग तुरंत उठ कर भाग गया. इसको देख उस खेत वालेने ऐसी फेंक कर लकड़ी मारी कि उससे सियार मारा गया; तथा चोक्तम् ,— त्रिभिर्वर्षैस्त्रिभिर्मासैस्त्रिभिः पक्षैस्त्रिभिर्दिनैः । अत्युत्कटैः पापपुण्यैरिहैव फलमश्नुते ॥ ८३ ॥ जैसा कहा है—प्राणी तीन वर्ष, तीन मास, तीन पक्ष, और तीन दिनमें, अधिक (बेहद) पाप और पुण्यका फल यहां ही भोगता है ॥ ८३ ॥ अतोऽहं ब्रवीमि—"भक्ष्यभक्षकयोः प्रीतिः" इत्यादि' ॥ इसी लिये मैं कहता हूं-"भोजन और भोजन करने वालेकी प्रीति" इत्यादि' ।