हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ८४- काकः पुनराह— 'भक्षितेनापि भवता नाहारो मम पुष्कलः । त्वयि जीवति जीवामि चित्रग्रीव इवानघ ! ॥ ८४ ॥ फिर कौवा बोला—'तुझे खा लेनेसे भी तो मेरा बहुत आहार नहीं होगा. मैं निष्कपट चित्रग्रीवके समान तेरे जीनेसे जीता रहूंगा ॥ ८४ ॥ अन्यच्च,— तिरश्चामपि विश्वासो दृष्टः पुण्यैककर्मणाम् । सतां हि साधुशीलत्वात्स्वभावो न निवर्तते ॥ ८५ ॥ और (पुण्यात्मामें) मृग-पक्षियोंकाभी विश्वास देखा जाता है; क्योंकि, पुण्यही करने वाले सज्जनोंका स्वभाव सज्जनताके कारण कभी नहीं पलटता है ॥ ८५ ॥ किंच,— साधोः प्रकोपितस्यापि मनो नायाति विक्रियाम् । न हि तापयितुं शक्यं सागराम्भस्तृणोल्कया' ॥ ८६ ॥ और चाहे जैसे क्रोधमें क्यों न हो सज्जनका स्वभाव कभी डामाडोल न होगा, जैसे (जलते हुए) तनकोंकी आंचसे समुद्रका जल कौन गरम कर सकता है ?' ॥ ८६ ॥ हिरण्यको ब्रूते—'चपलस्त्वम् । चपलेन सह स्नेहः सर्वथा न कर्तव्यः । हिरण्यकने कहा—'तू चंचल है. ऐसे चंचलके साथ स्नेह कभी नहीं करना चाहिये. तथा चोक्तम्,— मार्जारो महिषो मेषः काकः कापुरुषस्तथा । विश्वासात्प्रभवन्त्येते विश्वासस्तत्र नोचितः ॥ ८७ ॥ जैसा कहा है कि—बिल्ली, भैंसा, भेड़, काक और ओछा (नीच) आदमी विश्वास करनेसे ये अपनी प्रभुता दिखाते हैं, इसलिये इनमें विश्वास करना उचित नहीं है ॥ ८७ ॥ किं चान्यत्, शत्रुपक्षो भवानस्माकम् । और दूसरा—तुम मेरे वैरीयोंके पक्षके हो;