भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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-१८९ ] धनलाभके विचारकी निंदा ६९ अपरं च,— धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता । प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ॥ १८५ ॥ और धर्मके लिये जिसको धनकी इच्छा है, उसको धनकी लालसा न होना अच्छा है, क्योंकि कीचड़को ( छू कर ) धोनेसेभी, उसका दूरसे स्पर्श न करनाही अच्छा है ॥ १८५ ॥ यतः,— यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि । भक्ष्यते सलिले नक्रैस्तथा सर्वत्र वित्तवान् ॥ १८६ ॥ क्योंकि—जैसे आकाशमें पक्षी, पृथ्वी पर सिंह आदि, और जलमें मगर आदि मांसको खाते हैं, वैसेही सर्वत्र धनवान् ( जुवारी चोर इत्यादिका भोजन ) है, अर्थात् ये उसे लूटते ठगते हैं ॥ १८६ ॥ राज्ञतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि । भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभृतामिव ॥ १८७ ॥ धनवानोंको राजा, जल, अग्नि, चोर, और अपने संबंधी जनोंसे, हमेशा ऐसा भय रहता है कि जैसा प्राणियोंको मृत्युसे ॥ १८७ ॥ तथा हि,— जन्मनि क्लेशबहुले किं नु दुःखमतः परम् ? । इच्छासंपद्यतो नास्ति यच्चेच्छा न निवर्तते ॥ १८८ ॥ और ( मनुष्यको ) जन्म लेनेमेंही बहुत क्लेश है, इससे अधिक और क्या दुःख होगा कि जिसमें इच्छाके अनुसार संपत्ति नहीं है और जिसमें इच्छा नहीं दूर होती है ॥ १८८ ॥ अन्यच्च भ्रातः ! शृणु,— धनं तावदसुलभं लब्धं कृच्छ्रेण रक्ष्यते । लब्धनाशो यथा मृत्युस्तस्मादेतन्न चिन्तयेत् ॥ १८९ ॥ और दूसरे—हे भाई ! सुनो-पहिले तो धनका, मिलना कठिन और मिलभी जाय तो फिर उसकी रखवाली कष्टसे होती है । और मिले हुए धनका नाश मृत्युके समान है, इसलिये इस(धनलाभ) की चिन्ता न करनी चाहिये ॥ १८९॥

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