भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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७० हितोपदेशः [ मित्रलाभः १९०- तृष्णां चेह परित्यज्य को दरिद्रः क ईश्वरः ? । तस्याश्चेत्प्रसरो दत्तो दास्यं च शिरसि स्थितम् ॥ १९० ॥ और इस संसारमें तृष्णाको त्याग देनेसे कौन दरिद्री और कौन धनवान् है ? और जिसने उसको अवकाश दिया उसके ही शिर पर दासता बैठी है ॥ १९०॥ अपरं च,— यद्यदेव हि वाञ्छेत ततो वाञ्छा प्रवर्तते । प्राप्त एवार्थतः सोऽर्थो यतो वाञ्छा निवर्तते ॥ १९१ ॥ और जब जिस वस्तुमें इच्छा होती है तब उसके लाभकी आशा होती है, और जब वह वस्तु किसी उपायसे मिल जाय तब इच्छा निवृत्त होती है ॥ १९१ किं बहुना पक्षपातेन ? मयैव सहात्र कालो नीयताम् । और मेरे अधिक पक्षपातसे क्या है ? मेरेही साथ यहां समय बिताओ; यतः,— आमरणान्ताः प्रणयाः कोपास्तत्क्षणभङ्गुराः । परित्यागाश्च निःसङ्गा भवन्ति हि महात्मनाम् ॥ १९२ ॥ क्योंकि—महात्माओंका स्नेह मरने तक, क्रोध केवल क्षणमात्र और परित्याग केवल संगरहित होता है अर्थात् वे कुछ बुराई नहीं करते हैं ॥ १९२ ॥ इति श्रुत्वा लघुपतनको ब्रूते-‘धन्योऽसि मन्थर ! सर्वथा श्लाघ्य- गुणोऽसि । यह सुन कर लघुपतनक बोला—‘हे मन्थर ! तुम धन्य हो, और तुम प्रशंसनीय गुणवाले हो । यतः,— सन्त एव सतां नित्यमापदुद्धरणक्षमाः । गजानां पङ्कमग्नानां गजा एव धुरंधराः ॥ १९३ ॥ क्योंकि—सज्जनही सज्जनोंकी आपत्तिको सर्वदा दूर करनेके योग्य होते हैं । जैसे कीचड़में फँसे हुए हाथियोंके निकालनेके लिये हाथीही समर्थ होते हैं ॥ १९३॥ यतः,— श्लाघ्यः स एको भुवि मानवानां स उत्तमः सत्पुरुषः स धन्यः ।

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