भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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-१९४ ] शिकारीके भयसे मृगकी आश्रययाचना ७१ यस्यार्थिनो वा शरणागता वा नाशाविभग्नाद्विमुखाः प्रयान्ति ॥ १९४ ॥ पृथ्वी पर पुरुषोंमें वही एक प्रशंसा पानेके योग्य है, वही उत्तम सज्जन पुरुष है, और उसीको धन्य है कि जिसके पाससे याचक अथवा शरणागत लोक निराश और विमुख हो कर नहीं जाते हैं ॥ १९४ ॥ तदेवं ते स्वेच्छाहारविहारं कुर्वाणाः संतुष्टाः सुख निवसन्ति' । तब वे इस प्रकार अपनी इच्छानुसार खाते-पीते खेलते-कूदते संतोष कर सुखसे रहने लगे ॥ अथ कदाचिच्चित्राङ्गनामा मृगः केनापि त्रासितस्तत्रागत्य मि- लितः । ततः पश्चादायान्तं मृगमवलोक्य भयं संचिन्त्य मन्थरो जलं प्रविष्टः, मूषिकश्च विवरं गतः, काकोऽप्युड्डीय वृक्षमारूढः । ततो लघुपतनकेन सुदूरं निरूप्य भयहेतुर्न कोऽप्यायातीत्यालोचि- तम् । पश्चात्तद्वचनादागत्य पुनः सर्वे मिलित्वा तत्रैवोपविष्टाः । मन्थरेणोक्तम्—भद्रम्, मृग ! स्वागतम् । स्वेच्छयोदकाद्याहारो- ऽनुभूयताम् । अत्रावस्थानेन वनमिदं सनाधीक्रियताम् ।' चित्राङ्गो ब्रूते—'लुब्धकत्रासितोऽहं भवतां शरणमागतः । भवद्भिः सह सख्यमिच्छामि ।' हिरण्यकोऽवदत्—'मित्रत्वं तावदस्माभिः सह भवताऽयत्नेन मिलितम् । फिर एक दिन चित्रांग नाम मृग किसीके डरके मारे उनसे आ कर मिला. इसके पीछे मृगको आता हुआ देख भयको सोच मन्थर तो पानीमें घुस गया. चूहा बिलमें चला गया और काक भी उड़ कर पेड़ पर जा बैठा । फिर लघुपतनकने दूरसे निर्णय किया कि, भयका कोई भी कारण नहीं है यह- सोचा । पीछे उसके वचनसे आकर सब मिल कर वहांही बैठ गये । मन्थरने कहा—'कुशल हो ? हे मृग ! तुम्हारा आना अच्छा हुआ । अपनी इच्छानुसार जल आहार आदि भोग करो अर्थात् खाओ, पीओ और यहां रह कर इस वनको सनाथ करो' । चित्रांग बोला—'व्याधके डरसे मैं तुम्हारी शरण आया हूं और तुम्हारे साथ मित्रता करनी चाहता हूं' । हिरण्यक बोला—'मित्रता तो हमारे साथ तुम्हारी अनायास हो गई है;