हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
७० हितोपदेशः [ मित्रलाभः १९०- तृष्णां चेह परित्यज्य को दरिद्रः क ईश्वरः ? । तस्याश्चेत्प्रसरो दत्तो दास्यं च शिरसि स्थितम् ॥ १९० ॥ और इस संसारमें तृष्णाको त्याग देनेसे कौन दरिद्री और कौन धनवान् है ? और जिसने उसको अवकाश दिया उसके ही शिर पर दासता बैठी है ॥ १९०॥ अपरं च,— यद्यदेव हि वाञ्छेत ततो वाञ्छा प्रवर्तते । प्राप्त एवार्थतः सोऽर्थो यतो वाञ्छा निवर्तते ॥ १९१ ॥ और जब जिस वस्तुमें इच्छा होती है तब उसके लाभकी आशा होती है, और जब वह वस्तु किसी उपायसे मिल जाय तब इच्छा निवृत्त होती है ॥ १९१ किं बहुना पक्षपातेन ? मयैव सहात्र कालो नीयताम् । और मेरे अधिक पक्षपातसे क्या है ? मेरेही साथ यहां समय बिताओ; यतः,— आमरणान्ताः प्रणयाः कोपास्तत्क्षणभङ्गुराः । परित्यागाश्च निःसङ्गा भवन्ति हि महात्मनाम् ॥ १९२ ॥ क्योंकि—महात्माओंका स्नेह मरने तक, क्रोध केवल क्षणमात्र और परित्याग केवल संगरहित होता है अर्थात् वे कुछ बुराई नहीं करते हैं ॥ १९२ ॥ इति श्रुत्वा लघुपतनको ब्रूते-‘धन्योऽसि मन्थर ! सर्वथा श्लाघ्य- गुणोऽसि । यह सुन कर लघुपतनक बोला—‘हे मन्थर ! तुम धन्य हो, और तुम प्रशंसनीय गुणवाले हो । यतः,— सन्त एव सतां नित्यमापदुद्धरणक्षमाः । गजानां पङ्कमग्नानां गजा एव धुरंधराः ॥ १९३ ॥ क्योंकि—सज्जनही सज्जनोंकी आपत्तिको सर्वदा दूर करनेके योग्य होते हैं । जैसे कीचड़में फँसे हुए हाथियोंके निकालनेके लिये हाथीही समर्थ होते हैं ॥ १९३॥ यतः,— श्लाघ्यः स एको भुवि मानवानां स उत्तमः सत्पुरुषः स धन्यः ।
-१९४ ] शिकारीके भयसे मृगकी आश्रययाचना ७१ यस्यार्थिनो वा शरणागता वा नाशाविभग्नाद्विमुखाः प्रयान्ति ॥ १९४ ॥ पृथ्वी पर पुरुषोंमें वही एक प्रशंसा पानेके योग्य है, वही उत्तम सज्जन पुरुष है, और उसीको धन्य है कि जिसके पाससे याचक अथवा शरणागत लोक निराश और विमुख हो कर नहीं जाते हैं ॥ १९४ ॥ तदेवं ते स्वेच्छाहारविहारं कुर्वाणाः संतुष्टाः सुख निवसन्ति' । तब वे इस प्रकार अपनी इच्छानुसार खाते-पीते खेलते-कूदते संतोष कर सुखसे रहने लगे ॥ अथ कदाचिच्चित्राङ्गनामा मृगः केनापि त्रासितस्तत्रागत्य मि- लितः । ततः पश्चादायान्तं मृगमवलोक्य भयं संचिन्त्य मन्थरो जलं प्रविष्टः, मूषिकश्च विवरं गतः, काकोऽप्युड्डीय वृक्षमारूढः । ततो लघुपतनकेन सुदूरं निरूप्य भयहेतुर्न कोऽप्यायातीत्यालोचि- तम् । पश्चात्तद्वचनादागत्य पुनः सर्वे मिलित्वा तत्रैवोपविष्टाः । मन्थरेणोक्तम्—भद्रम्, मृग ! स्वागतम् । स्वेच्छयोदकाद्याहारो- ऽनुभूयताम् । अत्रावस्थानेन वनमिदं सनाधीक्रियताम् ।' चित्राङ्गो ब्रूते—'लुब्धकत्रासितोऽहं भवतां शरणमागतः । भवद्भिः सह सख्यमिच्छामि ।' हिरण्यकोऽवदत्—'मित्रत्वं तावदस्माभिः सह भवताऽयत्नेन मिलितम् । फिर एक दिन चित्रांग नाम मृग किसीके डरके मारे उनसे आ कर मिला. इसके पीछे मृगको आता हुआ देख भयको सोच मन्थर तो पानीमें घुस गया. चूहा बिलमें चला गया और काक भी उड़ कर पेड़ पर जा बैठा । फिर लघुपतनकने दूरसे निर्णय किया कि, भयका कोई भी कारण नहीं है यह- सोचा । पीछे उसके वचनसे आकर सब मिल कर वहांही बैठ गये । मन्थरने कहा—'कुशल हो ? हे मृग ! तुम्हारा आना अच्छा हुआ । अपनी इच्छानुसार जल आहार आदि भोग करो अर्थात् खाओ, पीओ और यहां रह कर इस वनको सनाथ करो' । चित्रांग बोला—'व्याधके डरसे मैं तुम्हारी शरण आया हूं और तुम्हारे साथ मित्रता करनी चाहता हूं' । हिरण्यक बोला—'मित्रता तो हमारे साथ तुम्हारी अनायास हो गई है;
७२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १९५- यतः,— औरसं कृतसम्बन्धं तथा वंशक्रमागतम् । रक्षितं व्यसनेभ्यश्च मित्रं ज्ञेयं चतुर्विधम् ॥ १९५ ॥ क्योंकि-मित्र चार प्रकारके होते हैं; एक तो औरस अर्थात् जन्मसेही हो जैसे पुत्रादि, और दूसरे विवाहादि संबन्धसे हो गये हों और तीसरे कुल-पर- म्परा से आए हुए हों, और चौथे वे जो आपत्तियोंसे बचावें ॥ १९५ ॥ तदत्र भवता स्वगृहनिर्विशेषं स्थीयताम्' । तच्छ्रुत्वा मृगः सानन्दो भूत्वा स्वेच्छाहारं कृत्वा पानीयं पीत्वा जलासन्नतुरुच्छायाया- मुपविष्टः । अथ मन्थरेणोक्तम्—'सखे मृग ! एतस्मिन्निर्जने वने केन त्रासितोऽसि ? कदाचित्किं व्याधाः संचरन्ति ?' । मृगेणो- क्तम्—'अस्ति कलिङ्गविषये रुक्माङ्गदो नाम नरपतिः । स च दिग्विजयव्यापारक्रमेणागत्य चन्द्रभागानदीतीरे समावासित- कटको वर्तते । प्रातश्च तेनात्रागत्य कर्पूरसरःसमीपे भवितव्य- मिति व्याधानां मुखात्किंवदन्ती श्रूयते । तदत्रापि प्रातरवस्थानं भयहेतुकमित्यालोच्य यथावसरकार्यमारभ्यताम्' । तच्छ्रुत्वा कूर्मः सभयमाह—'जलाशयान्तरं गच्छामि' । काकमृगावप्युक्त- वन्तौ—'एवमस्तु' । ततो हिरण्यको विहस्याह—'जलाशयान्तरे प्राप्ते मन्थरस्य कुशलम् । स्थले गच्छतः कः प्रतीकारः ? इसलिये यहां तुम अपने घरसेभी अधिक आनन्दसे रहो । यह सुन कर मृग प्रसन्न हो अपनी इच्छानुसार भोजन करके तथा जल पी कर जलके पास वृक्षकी छायामें बैठ गया ॥ मन्थरने कहा कि-'हे मित्र मृग ! इस निर्जन वनमें तुम्हें किसने डराया है ? क्या कभी कभी व्याध आ जाते हैं ?' । मृगने कहा-'कलिंग देशमें रुक्मांगद नाम राजा है । और वह दिग्विजय करनेके लिये आ कर चन्द्रभागा नदीके तीर पर अपनी सेनाको टिका कर ठहरा है । और प्रातःकाल वह यहां आ कर कर्पूरसरोवरके पास ठहरेगा यह उड़ती हुई बात शिकारीयोंके मुखसे सुनी जाती है । इसलिये प्रातःकाल यहां रहनाभी भयका कारण है । यह सोच कर समयके अनुसार काम करना चाहिये' । यह सुन कर कछुआ डर कर बोला-'मैं तो दूसरे सरोवरको जाता हूं' । काग और मृगनेभी कहा-'ऐसाही हो अर्थात् चलो' । फिर हिरण्यक हँस कर बोला-'दूसरे सरोवरतक पहुंचने पर मंथर जीता बचेगा । परंतु इसके पटपड़में चलनेका कौनसा उपाय है ?
-१९८ ] बुद्धिवलके लिये वीरसेन की कहानी ७३
-१९८ ] बुद्धिवलके लिये वीरसेन की कहानी ७३ यतः,— अम्भांसि जलजन्तूनां दुर्गं दुर्गनिवासिनाम् । स्वभूमिः श्वापदादीनां राज्ञां मन्त्री परं बलम् ॥ १९६ ॥ क्योंकि-जलके जन्तुओंको जलका, गढ़में रहने वालोंको गढ़का, सिंहादि वन- चरोंको अपनी भूमीका, और राजाओंको मंत्रीका, परम बल होता है ॥ १९६ ॥ सखे लघुपतनक ! अनेनोपदेशेन तथा भवितव्यम्, हे सखे लघुपतनक ! इस उपदेशसे वह गति होगी; स्वयं वीक्ष्य यथा वध्वाः पीडितं कुचकुड्मलम् । वणिक्पुत्रोऽभवद्दुःखी त्वं तथैव भविष्यसि' ॥ १९७ ॥ जैसे कि एक बनियेका पुत्र आपही अपनी स्त्रीके कमलकी कलीके समान कुच (राजाको) मसलते हुए देख कर दुःखी हुआ, वैसेही तुम भी होंगे' ॥ १९७ ॥ ते ऊचुः—'कथमेतत् ?' । हिरण्यकः कथयति— वे दोनो पूछने लगे—'यह कथा कैसी है ?'. हिरण्यक कहने लगा— कथा ७ [राजकुमार, एक सुंदर युवति और उसके पतिकी कहानी ७] अस्ति कान्यकुब्जविषये वीरसेनो नाम राजा । तेन वीरपुर- नाम्नि नगरे तुङ्गबलो नाम राजपुत्रो भोगपतिः कृतः । स च महाधनस्तरुण एकदा स्वनगरे भ्राम्यन्नतिप्रौढयौवनां लावण्य- वतीं नाम वणिक्पुत्रवधूमालोकयामास । ततः स्वहर्म्यं गत्वा स्मराकुलमतिस्तस्याः कृते दूतीं प्रेषितवान् । कान्यकुब्ज देशमें एक वीरसेन नामक राजा था । उसने वीरपुर नाम नगरमें तुंगबल नाम राजपुत्रको युवराज कर दिया था । उस बड़े धनवान् तरुणने एक दिन नगरमें फिरते हुए एक नव-यौवनवती लावण्यवती नामक बनियेकी पुत्रवधूको देखा । फिर अपने राजभवनमें जा कर कामान्ध हो उसके लिये दूती भेजी. यतः,— सन्मार्गे तावदास्ते, प्रभवति पुरुषस्तावदेवेन्द्रियाणां, लज्जां तावद्विधत्ते, विनयपि समालम्बते तावदेव । भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथगता नीलपक्ष्मण एते यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति ॥
७४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १९९- क्योंकि-पुरुष तभी तक अच्छे मार्गमें रहता है, तभी तक इन्द्रियोंको वशमें रखता है, तभी तक लज्जा रखता है, और तभी तक नम्रताका सहारा करता है, कि, जब तक सुन्दर सुन्दर स्त्रियोंको भौंहरूपी धनुषसे खींच कर छोड़े गये और कानके मार्ग तक खींचे गये, धैर्यको तोड़ने वाले ये नीले पलकवाले नेत्र(कटाक्ष)- रूपी बाण हृदयमें नहीं लगते हैं ॥ १९८ ॥ सापि लावण्यवती तदवलोकनक्षणात्प्रभृति स्मरशरप्रहारजर्ज- रितहृदया तदेकचित्ताऽभवत् । उस लावण्यवतीनेभी जिस समयसे उसे देखा था उसी क्षणसे कामदेवके बाणोंके प्रहारसे जिसका हृदय छेद गया था ऐसी वह उसीके ध्यानमें मग्न हो गई । तथा ह्युक्तम्,— असत्यं साहसं माया मात्सर्यं चातिलुब्धता । निर्गुणत्वमशौचत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥ १९९ ॥ जैसा कहा भी है—झूठ, साहस, छल, ईर्ष्या, अत्यन्त लोभ, निर्गुणता और अशुद्धता, ये दोष स्त्रियोंके स्वभावहीसे होते हैं ॥ १९९ ॥ अथ दूतीवचनं श्रुत्वा लावण्यवत्युवाच—'अहं पतिव्रता कथ- मेतस्मिन्नधर्मे पतिलङ्घने प्रवर्ते ? फिर दूतीकी बात सुन कर लावण्यवती बोली-'मैं पतिव्रता हूं, पतिके अनादर ( पातिव्रत्य-भंग ) करने वाले इस अधर्ममें कैसे प्रवृत्त होऊं ? यतः,— सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रजावती । सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता ॥ २०० ॥ क्योंकि-जो गृहस्थाश्रमके कार्यमें कुशल, पुत्रवती, पतिको प्राणोंके समान समझने वाली, तथा पतिव्रता है वह 'भार्या' कहलाती है ॥ २०० ॥ न सा भार्येति वक्तव्या यस्या भर्त्ता न तुष्यति । तुष्टे भर्तरि नारीणां संतुष्टाः सर्वदेवताः ॥ २०१ ॥ १ यह श्लोक दो पक्षमें लगता है अर्थात् धनुष और स्त्रीपक्षमें । धनुष और भौंहोंकी, नीलपलक और नीले पंखकी, और नेत्र और बाणकी समता है.
-२०२] हाथीको मारनेकी धूर्त गीदड़की युक्ति ७५ जिससे पति संतुष्ट न हो वह भार्या नहीं कही जाती है, क्योंकि स्त्रियोंके पति संतुष्ट होनेसे सब देवताएँ संतुष्ट होती हैं ॥ २०१ ॥ ततो यद्यदादिशति मे प्राणेश्वरस्तदेवाहमविचारितं करोमि ।' दूत्योक्तम्-'सत्यतममेतत् ।' लावण्यवत्युवाच-'ध्रुवं सत्यमेतत् ॥' ततो दृतिकया गत्वा तत्तत्सर्वं तुङ्गबलस्याग्रे निवेदितम् । तच्छ्रुत्वा तुङ्गबलोऽब्रवीत्—'विषमेपुणा व्रणितहृदयस्तां विना कथमहं जीविष्यामि ?' । कुट्टन्याह—'स्वामिनानीय समर्पयितव्या' इति । स प्राह—'कथमेतच्छक्यम् ?' । कुट्टन्याह—'उपायः क्रियताम् । इसलिये जो जो मेरा पति मुझे आज्ञा देता है उसे बिना विचारे करती हूं. दूती बोली-'यह बात बहुत सच्ची है ॥' लावण्यवतीने कहा-'वास्तवमें सच्ची है ॥' फिर दूतीने जा कर यह सब समाचार तुंगबलके आगे रखे ॥ वह सुन कर तुंगबलने कहा-'तीक्ष्ण बाणसे टुकड़े टुकड़े हुए हृदय वाला मैं उसके बिना कैसे जीऊंगा ? दूतीने कहा-'उसका पति लाकर सौंप देगा.' उसने कहा-'यह कैसे हो सकता है ?' कुटनी बोली-'उपाय कीजिये; तथा चोक्तम्,— उपायेन हि यच्छक्यं न तच्छक्यं पराक्रमैः । शृगालेन हतो हस्ती गच्छता पङ्कवर्त्मना' ॥ २०२ ॥ जैसा कहा भी है—जो बात उपायसे हो सकती है वह पराक्रमसे नहीं हो सकती है, जैसे कीचड़के मार्गसे जाते हुए हाथीको सियारने मार डाला' ॥ २०२ ॥ राजपुत्रः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । सा कथयति— राजपुत्र पूछने लगा-'यह कथा कैसी है ?' वह कहने लगी— कथा ८ [ धूर्त गीदड़ और कर्पूरतिलक हाथीकी कहानी ८ ] अस्ति ब्रह्मारण्ये कर्पूरतिलको नाम हस्ती । तमवलोक्य सर्वे शृगालाश्चिन्तयन्ति स्म—'यद्ययं केनाप्युपायेन म्रियते तदाऽस्माकमेतद्देहेन मासचतुष्टयस्य भोजनं भविष्यति ।' तत्रैकेन वृद्धशृगालेन प्रतिज्ञातम्—'मया बुद्धिप्रभावादस्य मरणं साध-
७६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः २०३- यितव्यम् ।' अनन्तरं स वञ्चकः कर्पूरतिलकसमीपं गत्वा साष्टाङ्गपातं प्रणम्योवाच—'देव ! दृष्टिप्रसादं कुरु' । हस्ती ब्रूते—'कस्त्वम् ? कुतः समायातः ?' । सोऽवदत्—'जम्बुकोऽहम् । सर्वैश्चैनवासिभिः पशुभिर्मिलित्वा भवत्सकाशं प्रस्थापितः । यद्विना राज्ञाऽवस्थातुं न युक्तम्, तदात्राटवीराज्येऽभिषेक्तुं भवान् सर्वस्वामिगुणोपेतो निरूपितः । ब्रह्मवनमें कर्पूरतिलक नामक हाथी था । उसको देख कर सब गीदड़ोंने सोचा 'यदि यह किसी उपायसे मारा जाय तो उसकी देहसे हमारा चार महीनेका भोजन होगा।' उनमेंसे एक बूढ़े गीदड़ने इस बातकी प्रतिज्ञा की-'मैं इसे बुद्धिके बलसे मार दूँगा' । फिर उस धूर्तने कर्पूरतिलक हाथीके पास जा कर साष्टांग प्रणाम करके कहा-'महाराज ! कृपादृष्टि कीजिये ।' हाथी बोला—'तू कौन है ? कहांसे आया है' ? वह बोला—'मैं गीदड़ हूं,' सब वनके रहने वाले पशुओंने पंचायत करके आपके पास भेजा है, कि बिना राजाके यहां रहना योग्य नहीं है इसलिये इस बनके राज्य पर राजाके सब गुणोंसे शोभायमान होने के कारण आपको ही राजतिलक करनेका निश्चय किया है. यतः,— यः कुलाभिजनाचारैरतिशुद्धः प्रतापवान् । धार्मिको नीतिकुशलः स स्वामी युज्यते भुवि ॥ २०३ ॥ क्योंकि—जो कुलाचार और लोकाचारमें निपुण हो तथा प्रतापी, धर्मशील, और नीतिमें कुशल हो वह पृथिवी पर राजा होनेके योग्य होता है ॥ २०३ ॥ अपरं च पश्य,— राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम् । राजन्यसति लोकेऽस्मिन्कुतो भार्या कुतो धनम् ? ॥२०४॥ और देखो—पहले राजाको ढूंढ़ना चाहिये, फिर स्त्री और उसके बाद धनको ढूंढ़े, क्योंकि राजाके नहीं होनेसे इस दुनियामें कहांसे स्त्री और कहांसे धन मिल सकता है ? ॥ २०४ ॥ अन्यच्च,— पर्जन्य इव भूतानामाधारः पृथिवीपतिः । विकलेऽपि हि पर्जन्ये जीव्यते न तु भूपतौ ॥ २०५ ॥
-२०७] गीदडकी चालसे हाथीका फँसना ७७ और दूसरे-राजा प्राणियोंका मेघके समान जीवनका सहारा है और मेघके नहीं बरसनेसे तो लोक जीता रहता है, परन्तु राजाके न होनेसे जी नहीं सकता है ॥ २०५ ॥ नियतविषयवर्ती प्रायशो दण्डयोगा- ज्जगति परवशेऽस्मिन्दुर्लभः साधुवृत्तः । कृशमपि विकलं वा व्याधितं वाऽधनं वा पतिमपि कुलनारी दण्डभीत्याऽभ्युपैति ॥ २०६ ॥ इस परवश (अर्थात् राजाके आधीन) इस संसारमें बहुधा दंडके भयसे लोग अपने नियत कार्योंमें लगे रहते हैं और नहीं तो अच्छे आचरणमें मनु- ष्योंका रहना कठिन है । क्योंकि दंडकेही भयसे कुलकी स्त्री दुबले, विकलांग (अर्थात् लंगड़े लूले) रोगी या निर्धनभी पतिको स्वीकार करती है ॥ २०६ ॥ तद्यथा लग्नवेला न विचलति तथा कृत्वा सत्वरमागम्यतां देवेन' । इत्युक्त्वोत्थाय चलितः । ततोऽसौ राज्यलोभाकृष्टः कर्पूरतिलकः शृगालवर्त्मना धावन्महापङ्के निमग्नः । ततस्तेन हस्तिनोक्तम्— ‘सखे शृगाल ! किमधुना विधेयम् ? पङ्के निपतितोऽहं म्रिये । परावृत्य पश्य' । शृगालेन विहस्योक्तम्-‘देव ! मम पुच्छकावलम्बनं कृत्वोत्तिष्ठ । यन्मद्विधस्य वचसि त्वया प्रत्ययः कृतस्तदनुभूयता- मशरणं दुःखम् । इस लिये, लग्नकी घड़ी न टल जाय, आप शीघ्र पधारिये । यह कह उठ कर चला फिर वह कर्पूरतिलक राज्यके लोभमें फँस कर शृगालके पीछे पीछे दौड़ता हुआ गाड़ी कीचड़में फँस गया । फिर उस हाथीने कहा-‘मित्र गीदड़ ! अब क्या करना चाहिये ? कीचड़में गिर कर मैं मरता हूं । लौट कर देख ।' गीदड़ने हंस कर कहा-‘महाराज ! मेरी पूंछका सहारा पकड़ कर उठो, जैसा मुझ सरीखेकी बात पर विश्वास किया तैसा शरणरहित दुःख का अनुभव करो । तथा चोक्तम्,— यदाऽसत्सङ्गरहितो भविष्यसि भविष्यसि । तदाऽसज्जनगोष्ठीषु पतिष्यसि पतिष्यसि' ॥ २०७ ॥ जैसा कहा है—जब बुरे संगसे बचोगे तब जानो जीओगे, और जो दुष्टोंकी संगतमें पड़ोगे तो मरोगे ॥ २०७ ॥
[Page Header: ७८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः २०८-]
ततो महापङ्के निमग्नो हस्ती शृगालैर्भक्षितः । अतोऽहं ब्रवीमि— “उपायेन हि यच्छक्यम्” इत्यादि । ततः कुट्टिन्युपदेशेन तं चारु- दत्तनामानं वणिक्पुत्रं स राजपुत्रः सेवकं चकार । ततोऽसौ तेन सर्वविश्वासकार्येषु नियोजितः ।
फिर बड़ी कीचड़में फँसे हुए हाथीको गीदड़ोंने खा लिया। इसलिये मैं कह- ता हूं-कि “उपायसे जो हो सकता है” इत्यादि. फिर उस राजपुत्रने कुटनीके उपदेशसे चारुदत्त नाम बनियेके पुत्रको सेवक बनाया। पीछे इसको उसने सब विश्वासके कार्योंमें नियुक्त कर दिया.
एकदा तेन राजपुत्रेण स्नातानुलिप्तेन कनकरत्नालंकार- धारिणा प्रोक्तम्-‘अद्यारभ्य मासमेकं गौरीव्रतं कर्तव्यम् । तदत्र प्रतिरात्रमेकां कुलीनां युवतीमानीय समर्पय । सा मया यथो- चितेन विधिना पूजयितव्या ।’ ततः स चारुदत्तस्तथाविधां नवयुवतीमानीय समर्पयति । पश्चात्प्रच्छन्नः सन्किमयं करो- तीति निरूपयति । स च तुङ्गबलस्तां युवतीमस्पृशन्नेव दूरा- द्वस्त्राऽलंकारगन्धचन्दनैः संपूज्य रक्षकं दत्त्वा प्रस्थापयति । अथ वणिक्पुत्रेण तद्दृष्ट्रोपजातविश्वासेन लोभाकृष्टमनसा स्ववधू- र्लावण्यवती समानीय समर्पिता । स च तुङ्गबलस्तां हृदयप्रियां लावण्यवतीं विज्ञाय ससंभ्रममुत्थाय निर्भरमालिङ्ग्य निमीलि- ताक्षः पर्यङ्के तया सह विललास । तदालोक्य वणिक्पुत्रश्चित्र- लिखित इवेतिकर्तव्यतामूढः परं विषादमुपगतः । अतोऽहं ब्रवीमि—“स्वयं वीक्ष्य” इत्यादि । तथा त्वयापि भवितव्यम्’ इति । तद्धितवचनमवधीर्य महता भयेन विमुग्ध इव तं जलाशयमुत्सृज्य मन्थरश्चलितः । तेऽपि हिरण्यकादयः स्नेहादनिष्टं शङ्कमाना मन्थरमनुगच्छन्ति । ततः स्थले गच्छत्के- नापि व्याधेन काननं पर्यटता मन्थरः प्राप्तः । प्राप्य तं गृहीत्वो- त्थाप्य धनुषि बद्ध्वा श्रमक्लेशात्क्षुत्पिपासाकुलः स्वगृहाभिमुखं चलितः । अथ मृगवायसमूषकाः परं विषादं गच्छन्तस्तमनुजग्मुः ।
-२०८] चातुर्यसे लावण्यवतीकी प्राप्ति ७९ एक दिन कुट्टनीके उपदेशसे उस राजपुत्रने नहा धो कर और देहमें चन्दन आदि सुगन्ध द्रव्य लगा कर और सुवर्णके रत्नजटित आभूषणोंको पहन कर कहा-'चारुदत्त ! आजसे लेकर एक मास तक मुझे पार्वतीजीका व्रत करना है । इसलिये आजसे यहां नित्य रातको एक कुलीन जवान स्त्री मुझे ला दिया कर, मैं उसकी यथोचित रीतिसे पूजा करूंगा' ॥ फिर वह चारुदत्त वैसीही नव- जवान स्त्री ला कर दिया करता था। और स्वयं छुप कर देखता रहता था, कि यह क्या करता है. और वह तुंगबल उस जवान स्त्रीको बिनाही छुए दूरसे वस्त्र, आभूषण, गन्ध चन्दनादिसे पूजा करके और रखवाला साथ दे कर विदा कर दिया करता था। फिर उस बनियेके पुत्रने यह देख विश्वाससे और चित्तमें लोभके मारे अपनी स्त्री लावण्यवतीको ला कर दे दिया । और उस तुंगबलने उसे प्राणप्यारी लावण्यवती जान कर शीघ्रतासे उठ गाढ़ा आलिंगन कर आनन्दसे नेत्रोंको कुछ बन्द-सा कर पलंग पर उसके साथ विलास किया । यह देख कर बनियेका बेटा चित्र लिखेके समान हो कर इस कार्यमें मूर्ख बन अधिक दुःखी हुआ । इसलिये मै कहता हूं कि, "आप देख कर" इत्यादि । और तुम भी वैसेही दुःखी बनोगे ।' उसके हितकारक बचनको न मान कर बड़े भयसे मूर्खकी भांति वह मन्थर उस सरोवरको छोड़ कर चला । वे हिरण्यक आदिभी स्नेहसे विपत्तिकी शंका करते हुए मन्थरके पीछे पीछे चले । फिर पटपड़में जाते हुए मन्थरको, बनमें घूमते हुए किसी व्याधने पाया । वह उसे पा कर और उठा कर धनुषमें बांध घूमता हुआ क्लेशसे उत्पन्न हुई क्षुधा और प्याससे व्याकुल, अपने घरकी ओर चला । पीछे मृग, काग और चूहा, ये बड़ा विषाद करते हुए उसके पीछे पीछे चले. ततो हिरण्यको विलपति— एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य । तावद्वितीयं समुपस्थितं मे छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥ २०८ ॥ फिर हिरण्यक विलाप करने लगा—'समुद्रके पारके समान निःसीम एक दुःखके पार जब तक मैं नहीं जाता हूं तब तक मेरे लिये दूसरा दुःख आ कर उपस्थित हो जाता है, क्योंकि अनर्थ (आपत्ति) के साथ बहुत-से अनर्थ आ पड़ते हैं ॥ २०८ ॥
स्वाभाविकं तु यन्मित्रं भाग्येनैवाभिजायते ।
८० हितोपदेशः [ मित्रलाभः २०९- स्वाभाविकं तु यन्मित्रं भाग्येनैवाभिजायते । तदकृत्रिमसौहार्दमापत्स्वपि न मुञ्चति ॥ २०९ ॥ स्वभावसे स्नेह करने वाला ( अकृत्रिम ) मित्र तो प्रारब्धसेही मिलता है कि जो सच्ची मित्रताको आपत्तियोंमेंभी नहीं छोड़ता है ॥ २०९ ॥ न मातरि न दारेषु न सोदर्ये न चात्मजे । विश्वासस्तादृशः पुंसां यादृङ्मित्रे स्वभावजे' ॥ २१० ॥ न मातामें, न स्त्रीमें, न सगे भाईमें, और न पुत्रमें ऐसा विश्वास होता है कि जैसा स्वाभाविक मित्रमें होता है ॥ २१० ॥ इति मुहुर्विचिन्त्य 'अहो दुर्देवम् ! इसप्रकार वारंवार सोच कर ( बोला )-'अहो दुर्भाग्य है ! यतः,— स्वकर्मसंतानविचेष्टितानि कालान्तरावर्तिशुभाशुभानि । इहैव दृष्टानि मयैव तानि जन्मान्तराणीव दशान्तराणि ॥ २११ ॥ क्योंकि—इस संसारमें अपने पापपुण्योंसे किये गये और समयके उलट- पलटसे बदलने वाले सुखदुःख, पूर्वजन्मके किये हुये पापपुण्यके फल मैंने यहांही देख लिये ॥ २११ ॥ अथवेत्थमेवैतत्,— कायः संनिहिता पायः संपदः पदमापदाम् । समागमाः सापगमाः सर्वमुत्पादि भङ्गुरम् ॥ २१२ ॥ अथवा यह ऐसेही है-शरीरके पासही उसका नाश है और संपत्तियां आप- त्तियोंका मुख्य स्थान हैं और संयोगके साथ वियोग है, अर्थात् अस्थिर है और उत्पन्न हुआ सब नाश होने वाला है ॥ २१२ ॥ पुनर्विमृश्याह— ‘शोकारातिभयत्राणं प्रीतिविश्रम्भभाजनम् । केन रत्नमिदं सृष्टं ‘मित्र’मित्यक्षरद्वयम् ॥ २१३ ॥ और विचार कर बोला-‘शोक और शत्रुके भयसे बचाने वाला, तथा प्रीति और विश्वासका पात्र, यह दो अक्षरका ‘मित्र’ रूपी रत्न किसने रचा है ? ॥२१३॥
-२१४ ] कछुएको छुडानेका यत्न ८१- किं च,— मित्रं प्रीतिरसायनं नयनयोरानन्दनं चेतसः पात्रं यत्सुखदुःखयोः सह भवेन्मित्रेण तद्दुर्लभम् । ये चान्ये सुहृदः समृद्धिसमये द्रव्याभिलाषाकुला- स्ते सर्वत्र मिलन्ति तत्त्वनिकषग्रावा तु तेषां विपत्' ॥२१४॥ और अंजनके समान नेत्रोंको प्रसन्न करने वाला, चित्तको आनन्द देने वाला और मित्रके साथ सुखदुःखमें साथ देने वाला, अर्थात् दुःखमें दुःखी, सुखमें सुखी हो ऐसा मित्र होना दुर्लभ है, और संपत्ति (चलती) के समयमें धन हरने वाले मित्र हर जगह मिलते हैं, परन्तु विपत्कालही उनके परखनेकी कसौटी है' ॥२१४ इति बहु विलप्य हिरण्यकश्चित्राङ्गलघुपतनकावाह- 'यावदयं व्याधो वनान्न निःसरति तावन्मन्थरं मोचयितुं यत्नः क्रियताम् ।' तावूचतुः-'सत्वरं कार्यमुच्यताम् ।' हिरण्यको ब्रूते-'चित्राङ्गो जलसमीपं गत्वा मृतमिवात्मानं दर्शयतु । काकश्च तस्योपरि स्थित्वा चञ्च्वा किमपि विलिखतु । नूनमनेन लुब्धकेन तत्र कच्छपं परित्यज्य मृगमांसार्थिना सत्वरं गन्तव्यम् । ततोऽहं मन्थरस्य बन्धनं छेत्स्यामि । संनिहिते लुब्धके भवद्भ्यां पलायितव्यम् ।' चित्राङ्गलघुपतनकाभ्यां शीघ्रं गत्वा तथानुष्ठिते सति स व्याधः श्रान्तः पानीयं पीत्वा तरोरधस्तादुपविष्टस्तथा- विधं मृगमपश्यत् । ततः कर्तरिकामादाय प्रहृष्टमना मृगान्तिकं चलितः । तत्रान्तरे हिरण्यकेनागत्य मन्थरस्य बन्धनं छिन्नम् । स कूर्मः सत्वरं जलाशयं प्रविवेश । स मृग आसन्नं तं व्याधं विलोक्योत्थाय पलायितः । प्रत्यावृत्य लुब्धको यावत्तरुतलमा- याति तावत्कूर्ममपश्यन्नचिन्तयत्—'उचितमेवैतन्ममासमीक्ष्य- कारिणः । इस प्रकार बहुत-सा विलाप करके हिरण्यकने चित्रांग और लघुपतनकसे कहा-'जब तक यह व्याध वनसे न निकल जाय तब तक मन्थरको छुड़ानेका यत्न करो।' वे दोनों बोले-'शीघ्र कार्यको कहिये।' हिरण्यक बोला-'चित्रांग जलके हि० ६
तुम्हारे पास आवे तब भाग जाना ।' जब चित्रांग और लघुपतनकने शीघ्र जा
८२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः २१५- पास जा कर मरेके समान अपना शरीर दिखावें और काक उस पर बैठके चोंचसे कुछ कुछ खोदें, यह व्याध कछुए को अवश्य वहां छोड़ कर मृगमांसके लोभसे शीघ्र जायगा । फिर मैं मन्थरके बंधन काट डालूंगा । और जब व्याध तुम्हारे पास आवे तब भाग जाना ।' जब चित्रांग और लघुपतनकने शीघ्र जा कर वैसाही किया तो वह व्याध पानी पी कर एक पेड़के नीचे बैठा मृगको उस प्रकार देख पाया । फिर छुरी लेकर आनंदित होता हुआ मृगके पास जाने लगा इतनेहीमें हिरण्यकने आ कर कछुएका बंधन काट डाला । तब वह कछुआ शीघ्र सरोवरमें घुस गया । वह मृग उस व्याधको पास आता हुआ देख उठ कर भाग गया । जब व्याध लौट कर पेड़के नीचे आया, तब कछुएको न देख कर सोचने लगा—'मेरे समान बिना विचार करने वालेके लिये यही उचित था । यतः,— यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते । ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि' ॥ २१५ ॥ क्योंकि—जो निश्चितको छोड़ अनिश्चित पदार्थका आसरा करता है उसके निश्चित पदार्थ नष्ट हो जाते हैं, और अनिश्चितभी जाता रहता है' ॥ २१५ ॥ ततोऽसौ स्वकर्मवशान्निराशः कटकं प्रविष्टः । मन्थरादयः सर्वे त्यक्तापदः स्वस्थानं गत्वा तथा सुखमास्थिताः ॥ फिर वह अपने प्रारब्धको दोष लगाता हुआ निराश होकर अपने घर गया । मंथर आदिभी सब आपत्तिसे निकल अपने अपने स्थान पर जा कर सुखसे रहने लगे । अथ राजपुत्रैः सानन्दमुक्तम्—‘सर्वं श्रुतवन्तः सुखिनो वयम्। सिद्धं नः समीहितम् ।' विष्णुशर्मोवाच—‘एतावता भवतामभि- लषितं संपन्नम् । पीछे राजपुत्र प्रसन्न होकर कहने लगे-‘हमने सब सुना और सुखी हुए हमारा कार्य सिद्ध हुआ ।' विष्णुशर्मा बोले-‘इतना आपका मनोरथ पूरा हुआ है ॥
इति हितोपदेशे मित्रलाभो नाम प्रथमः कथासंग्रहः समाप्तः ।
-२१६ ] मित्रलाभकी प्रशस्ति ८३- अपरमपीदमस्तु— मित्रं प्राप्नुत सज्जना जनपदैर्लक्ष्मीः समालम्ब्यतां भूपालाः परिपालयन्तु वसुधां शश्वत्स्वधर्मे स्थिताः । आस्तां मानसतुष्टये सुकृतिनां नीतिर्नवोढेव वः कल्याणं कुरुतां जनस्य भगवांश्चन्द्रार्धचूडामणिः'॥२१६॥ इति हितोपदेशे मित्रलाभो नाम प्रथमः कथासंग्रहः समाप्तः । यह औरभी होय—सज्जन लोग मित्रको पावें, नगरनिवासी लक्ष्मीको पावें, राजा लोग सदा अपने धर्ममें रह कर पृथ्वीका रक्षण करें, आपकी नीति नव- यौवना स्त्रीके समान पण्डितोंके चित्तको प्रसन्न करें और भगवान् महादेवजी आपका कल्याण करें ॥ २१६ ॥ पं० रामेश्वरभट्टका किया हुआ हितोपदेश ग्रंथके मित्रलाभ नामक पहले अध्यायका भाषा अनुवाद समाप्त हुआ. शुभम्.
हितोपदेशः ❦ सुहृद्भेदः २ अथ राजपुत्रा ऊचुः—'आर्य ! मित्रलाभः श्रुतस्तावदस्माभिः । इदानीं सुहृद्भेदं श्रोतुमिच्छामः ।' विष्णुशर्मोवाच—'सुहृद्भेदं तावच्छृणुत; फिर राजपुत्र बोले-‘गुरुजी ! मित्रलाभ तो हम सुन चुके, अब सुहृद्भेद सुनना चाहते हैं ।' विष्णुशर्मा बोले–‘अब सुहृद्भेद सुनिये; यस्यायमाद्यः श्लोकः— वर्धमानो महास्नेहो मृगेन्द्रवृषयोर्वने । पिशुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः' ॥ १ ॥ उसका पहला वाक्य यह है—‘वनमें सिंह और बैलका बड़ा स्नेह बढ़ गया था, उसे धूर्त और अति लोभी गीदड़ने छुड़वा दिया' ॥ १ ॥ राजपुत्रैरुक्तम्—'कथमेतत् ?' । विष्णुशर्मा कथयति— राजपुत्र बोले–‘यह कथा कैसे है ?' विष्णुशर्मा कहने लगे. कथा १ [ एक बनिया, बैल, सिंह और गीदड़ोंकी कहानी ] 'अस्ति दक्षिणापथे सुवर्णवती नाम नगरी । तत्र वर्धमानो नाम वणिक् निवसति । तस्य प्रचुरेऽपि वित्तेऽपरान्बन्धूनतिसमृद्धा- न्समीक्ष्य पुनरर्थवृद्धिः करणीयेति मतिर्बभूव । 'दक्षिण दिशामें सुवर्णवती नाम नगरी है; उसमें वर्धमान नाम एक बनिया रहता था । उसके पास बहुत-सा धनभी था, परन्तु अपने दूसरे भाईबन्धुओंको अधिक धनवान् देख कर उसकी यह लालसा हुई की और अधिक धन इकट्ठा करना चाहिये.
-६ ] द्रव्यविषयक परामर्श ८५ यतः,— अधोऽधः पश्यतः कस्य महिमा नोपचीयते ? । उपर्युपरि पश्यन्तः सर्व एव दरिद्रति ॥ २ ॥ क्योंकि—अपनेसे नीचे नीचे (हीन) अर्थात् दरिद्रियोंको देख कर किसकी महिमा नहीं बढ़ती है ? अर्थात् सबको अभिमान बढ़ जाता है, और अपनेसे ऊपर ऊपर अर्थात् अधिक धनवानोंको देख कर सब लोग अपनेको दरिद्री समझते हैं ॥ २ ॥ अपरं च,— ब्रह्महापि नरः पूज्यो यस्यास्ति विपुलं धनम् । शशिनस्तुल्यवंशोऽपि निर्धनः परिभूयते ॥ ३ ॥ और दूसरे-जिसके पास बहुत-सा धन है उस ब्रह्मघातक मनुष्यकाभी सत्कार होता है और चन्द्रमाके समान अतिनिर्मल वंशमें उत्पन्न हुएभी निर्धन मनुष्यका अपमान किया जाता है ॥ ३ ॥ अन्यच्च,— अव्यवसायिनमलसं दैवपरं साहसाच्च परिहीनम् । प्रमदेव हि वृद्धपतिं नेच्छत्युपगूहितुं लक्ष्मीः ॥ ४ ॥ और जैसे नवजवान स्त्री बूढ़े पतिको नहीं चाहती है वैसेही लक्ष्मीभी निरुद्योगी, आलसी, 'प्रारब्धमें जो लिखा है सो होगा' ऐसा भरोसा रख कर चुपचाप बैठने वाले, तथा पुरुषार्थ हीन मनुष्यको नहीं चाहती है ॥ ४ ॥ अपि च,— आलस्यं स्त्रीसेवा सरोगता जन्मभूमिवात्सल्यम् । संतोषो भीरुत्वं षड् व्याघाता महत्त्वस्य ॥ ५ ॥ औरभी आलस्य, स्त्रीकी सेवा, रोगी रहना, जन्मभूमिका स्नेह, संतोष और डरपोकपन ये छः बातें उन्नतिके लिये बाधक हैं ॥ ५ ॥ यतः,— संपदा सुस्थितंमन्यो भवति स्वल्पयापि यः । कृतकृत्यो विधिर्मन्ये न वर्धयति'तस्य ताम् ॥ ६ ॥ क्योंकि-जो मनुष्य थोड़ीही संपत्तिसे अपनेको सुखी मानता है, विधाता समाप्तकार्य मान कर उस मनुष्यकी उस संपत्तिको नहीं बढ़ाता है ॥ ६ ॥
८६ हितोपदेशः [सुहृद्भेदः ७- अपरं च,- निरुत्साहं निरानन्दं निर्वीर्यमरिनन्दनम् । मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत्पुत्रमीदृशम् ॥ ७ ॥ और निरुत्साही, आनन्दरहित, पराक्रमहीन तथा शत्रुको प्रसन्न करने वाले ऐसे पुत्रको कोई स्त्री न जने अर्थात् ऐसे पुत्रका जन्म न होनाही अच्छा है ॥७॥ तथा चोक्तम्,- अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेद्भवक्षयात् । रक्षितं वर्धयेत् सम्यग्वृद्धं तीर्थेषु निक्षिपेत् ॥ ८ ॥ जैसा कहा है—नहीं पाये धनके पानेकी इच्छा करना, पाये हुए धनकी चोरी आदि नाशसे रक्षा करना, रक्षा किये हुए धनको व्यापार आदिसे बढ़ाना और अच्छी तरह बढ़ाए धनको सत्पात्रमें दान करना चाहिये ॥ ८ ॥ यतो लब्धुमिच्छतोऽर्थयोगादर्थस्य प्राप्तिरेव । लब्धस्याप्यरक्षि- तस्य निधेरपि स्वयं विनाशः । अपि च, अवर्धमानश्चार्थः काले स्वल्पव्ययोऽप्यञ्जनवत्क्षयमेति । अनुपभुज्यमानश्च निष्प्रयोजन एव सः । क्योंकि लाभकी इच्छा करने वालेको धन मिलताही है, एवं प्राप्त हुए परंतु रक्षा नहीं किये गये खजानेकाभी अपने आप नाश हो जाता है, औरभी यह है कि-बढ़ाया नहीं गया धन कुछ कालमें थोड़ा थोड़ा व्यय हो कर काजलके समान नाश हो जाता है, और नहीं भोगा गया भी खजाना वृथा है । तथा चोक्तम्,- धनेन किं यो न ददाति नाश्नुते बलेन किं यश्च रिपून बाधते । श्रुतेन किं यो न च धर्ममाचरेत् किमात्मना यो न जितेन्द्रियो भवेत् ॥ ९ ॥ जैसा कहा है—उस धनसे क्या है ? जो न देता है और न खाता (उपभोग करता) है; उस बलसे क्या है ? जो वैरियाँको नहीं सताता है, उस शास्त्रसे क्या है ? जो धर्मका आचरण नहीं करता है; और उस आत्मासे क्या है ? जो जितेंद्रिय नहीं है ॥ ९ ॥
-१३ ] द्रव्यसंचय और पुरुषार्थकी प्रशंसा ८७ यतः,— जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः । स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥ १० ॥ क्योंकि—जैसे जलकी एक एक बूंदके गिरनेसे धीरे २ घड़ा भर जाता है वही कारण सब प्रकारकी विद्याओंका, धनका और धर्मकाभी है ॥ १० ॥ दानोपभोगरहिता दिवसा यस्य यान्ति वै । स कर्मकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति' ॥ ११ ॥ दान और भोगके बिना जिसके दिन जाते हैं वह लुहारकी धोंकनीके समान सांस लेता हुआभी मरेके समान है ॥ ११ ॥ इति संचिन्त्य नन्दकसंजीवकनामानौ वृषभौ धुरि नियोज्य शकटं नानाविधद्रव्यपूर्णं कृत्वा वाणिज्येन गतः कश्मीरं प्रति । यह सोच कर नन्दक और संजीवक नाम दो बैलोंको जुएमें जोत कर और छकड़ेको नाना प्रकारकी वस्तुओंसे लाद कर व्यापारके लिये काश्मीरकी ओर गया। अन्यच्च,— अञ्जनस्य क्षयं दृष्ट्वा वल्मीकस्य च संचयम् । अवन्ध्यं दिवसं कुर्याद्दानाध्ययनकर्मसु ॥ १२ ॥ और दूसरे—काजलके क्रम क्रमसे घटनेको और वल्मीक नाम चींटीके संच- यको देख कर, दान, पढ़ना और कामधंधामें दिनको सफल करना चाहिये ॥१२॥ यतः,— कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ? । को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ? ॥ १३ ॥ क्योंकि—बलवानोंको अधिक बोझ क्या है ? और उद्योग करने वालोंको क्या दूर है ? और विद्यावानोंको विदेश क्या है ? और मीठे बोलने वालोंका शत्रु कौन है ? ॥ १३ ॥ अथ गच्छतस्तस्य सुदुर्गनाम्नि महारण्ये संजीवको भग्नजानु- र्निपतितः । फिर उस जाते हुएका, सुदुर्ग नाम घने वनमें, संजीवक घुटना टूटनेसे गिर पडा ।
[Page Header] ८८ हितोपदेशः [सुहृद्भेदः १४-
तमालोक्य वर्धमानोऽचिन्तयत्— ‘करोतु नाम नीतिज्ञो व्यवसायमितस्ततः । फलं पुनस्तदेवाप्यं यद्विधेर्मनसि स्थितम् ॥ १४ ॥ उसे देख कर वर्धमान चिंता करने लगा—‘नीति जानने वाला इधर उधर भले ही व्यापार करे, परंतु उसको लाभ उतना ही होता है कि जितना विधाताके जीमें है ॥ १४ ॥ किंतु,— विस्मयः सर्वथा हेयः प्रत्यूहः सर्वकर्मणाम् । तस्माद्विस्मयमुत्सृज्य साध्ये सिद्धिर्विधीयताम्’ ॥ १५ ॥ परंतु—सब कार्योंको रोकने वाले संशयको छोड़ देना चाहिये, एवं संदेहको छोड़ कर, अपना कार्य सिद्ध करना चाहिये’ ॥ १५ ॥ इति संचिन्त्य संजीवकं तत्र परित्यज्य वर्धमानः पुनः स्वयं धर्मपुरं नाम नगरं गत्वा महाकायमन्यं वृषभमेकं समानीय धुरि नियोज्य चलितः। ततः संजीवकोऽपि कथंकथमपि खुरत्रये भारं कृत्वोत्थितः। यह विचार कर संजीवकको वहां छोड़ कर-फिर वर्धमान आप धर्मपुर नाम नगरमें जा कर एक दूसरे बड़े शरीर वाले बैलको ला कर जुएमें जोत कर चल दिया। फिर संजीवकभी बड़े कष्टसे तीन खुरोंके सहारे उठ कर खडा हुआ। यतः,— निमग्नस्य पयोराशौ पर्वतात्पतितस्य च । तक्षकेणापि दष्टस्य आयुर्मर्माणि रक्षति ॥ १६ ॥ क्योंकि—समुद्रमें डूबे हुएकी, पर्वतसे गिरे हुएकी और तक्षक नाम सर्पसे डसे हुएकी आयुकी प्रबलता मर्म (जीवनस्थान) की रक्षा करती है ॥ १६ ॥ नाकाले म्रियते जन्तुर्विद्धः शरशतैरपि । कुशाग्रेणैव संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति ॥ १७ ॥ जो काल न होय तो सैकड़ों बाणोंके बिंधनेसेभी प्राणी नहीं मरता है और जो काल आ जाय तो केवल कुशाकी नोंकसे छूतेही मर जाता है ॥ १७ ॥
-१९ ] दैवकी समस्या ८९ अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे न जीवति ॥ १८ ॥ दैवसे रक्षा किया हुआ, विना रक्षाके भी ठहरता ( बच जाता ) है, और अच्छी तरह रक्षा किया हुआ भी, दैवका मारा हुआ नहीं बचता है, जैसे वनमें छोड़ा हुआ सहायहीनभी जीता रहता है, घर पर कई उपाय करनेसेभी नहीं जीता है ॥ १८ ॥ ततो दिनेषु गच्छत्सु संजीवकः स्वेच्छाहारविहारं कृत्वारण्यं भ्राम्यन् हृष्टपुष्टाङ्गो बलवन्ननाद । तस्मिन्वने पिङ्गलकनामा सिंहः स्वभुजोपार्जितराज्यसुखमनुभवन्निवसति । फिर कितनेही दिनोंके बाद संजीवक अपनी इच्छानुसार खाता पीता वनमें फिरता फिरता हृष्ट पुष्ट हो कर ऊंचे स्वरसे डकराने लगा; उसी बनमें पिंगलक नाम एक सिंह अपनी भुजाओं ( स्वबल ) से पाये हुए राज्यके सुखका भोग करता हुआ रहता था. तथा चोक्तम्— नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते मृगैः । विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता ॥ १९ ॥ जैसा कहा है—मृगोंने सिंहका न तो राज्यतिलक किया और न संस्कार किया परंतु सिंह अपने आपही पराक्रमसे राज्यको पा कर मृगोंका राजा होना दिखला- ता है ॥ १९ ॥ स चैकदा पिपासाकुलितः पानीयं पातुं यमुनाकच्छमगच्छत् । तेन च तत्र सिंहेनाननुभूतपूर्वकमकालघनगर्जितमिव संजीवक- नर्दितमश्रावि । तच्छ्रुत्वा पानीयमपीत्वा स चकितः परिवृत्य स्वस्थानमागत्य किमिदमित्यालोचयस्तूष्णीं स्थितः । स च तथा- विधः करटकदमनकाभ्यामस्य मन्त्रिपुत्राभ्यां शृगालाभ्यां दृष्टः । तं तथाविधं दृष्ट्वा दमनकः करटकमाह—'सखे करटक ! किमित्य- यमुदकार्थी स्वामी पानीयमपीत्वा सचकितो मन्दं मन्दमव-