भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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७४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १९९- क्योंकि-पुरुष तभी तक अच्छे मार्गमें रहता है, तभी तक इन्द्रियोंको वशमें रखता है, तभी तक लज्जा रखता है, और तभी तक नम्रताका सहारा करता है, कि, जब तक सुन्दर सुन्दर स्त्रियोंको भौंहरूपी धनुषसे खींच कर छोड़े गये और कानके मार्ग तक खींचे गये, धैर्यको तोड़ने वाले ये नीले पलकवाले नेत्र(कटाक्ष)- रूपी बाण हृदयमें नहीं लगते हैं ॥ १९८ ॥ सापि लावण्यवती तदवलोकनक्षणात्प्रभृति स्मरशरप्रहारजर्ज- रितहृदया तदेकचित्ताऽभवत् । उस लावण्यवतीनेभी जिस समयसे उसे देखा था उसी क्षणसे कामदेवके बाणोंके प्रहारसे जिसका हृदय छेद गया था ऐसी वह उसीके ध्यानमें मग्न हो गई । तथा ह्युक्तम्,— असत्यं साहसं माया मात्सर्यं चातिलुब्धता । निर्गुणत्वमशौचत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥ १९९ ॥ जैसा कहा भी है—झूठ, साहस, छल, ईर्ष्या, अत्यन्त लोभ, निर्गुणता और अशुद्धता, ये दोष स्त्रियोंके स्वभावहीसे होते हैं ॥ १९९ ॥ अथ दूतीवचनं श्रुत्वा लावण्यवत्युवाच—'अहं पतिव्रता कथ- मेतस्मिन्नधर्मे पतिलङ्घने प्रवर्ते ? फिर दूतीकी बात सुन कर लावण्यवती बोली-'मैं पतिव्रता हूं, पतिके अनादर ( पातिव्रत्य-भंग ) करने वाले इस अधर्ममें कैसे प्रवृत्त होऊं ? यतः,— सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रजावती । सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता ॥ २०० ॥ क्योंकि-जो गृहस्थाश्रमके कार्यमें कुशल, पुत्रवती, पतिको प्राणोंके समान समझने वाली, तथा पतिव्रता है वह 'भार्या' कहलाती है ॥ २०० ॥ न सा भार्येति वक्तव्या यस्या भर्त्ता न तुष्यति । तुष्टे भर्तरि नारीणां संतुष्टाः सर्वदेवताः ॥ २०१ ॥ १ यह श्लोक दो पक्षमें लगता है अर्थात् धनुष और स्त्रीपक्षमें । धनुष और भौंहोंकी, नीलपलक और नीले पंखकी, और नेत्र और बाणकी समता है.