इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंआयुर्वेद में गर्भ स्थिति को लिये रजः वीर्य का दोष रहित शुद्ध होना अनिवार्य है। इनमें से किसी एक में अथवा दोनों में कोई भी दोष है तो गर्भ स्थिति नहीं हो सकेगी। यदि गर्भ स्थित हो भी गया तो उस गर्भ से उत्पन्न बालक विकृत होगा अर्थात् अंग बिहेग होगा। आयुर्वेद में पुरुष शुक्राणुओं के न्यूनाधिक होने की और स्त्रियों में अण्डे के उपस्थित होने की कोई चर्चा नहीं है। वहीं पर तो केवल शुक्र और आर्तव की परम शुद्धता का ही उल्लेख है। शुद्ध शुक्र और आर्तव के लक्षण तथा दोष अधिकृत करते हैं।
शुक्र-दोष (वीर्य)
वात पित्त श्लेष्म शोणित कृष्णपग्रन्थि
पूति पूय क्षीण मूत्र पुरीष रेतसः।
सुश्रुत शरीर स्थान २/१
वात, पित्त, कफ, रक्त, दुर्गन्ध, गौंडदार, मवाद युक्त, क्षीण वीर्य, मूत्रगन्धी, मलगन्धी, दोष वाले पुरुष गृहस्थ में असमर्थ होते हैं।
आर्तव-दोष (रजः)
तेषु कृष्णपग्रन्थि पूतियक्षीण मूत्रपुरीष
प्रकाशमसाध्य साध्यमन्यद् भवति॥
सुश्रुत २/२
कृष्णक (सड़े मुर्दे की गन्ध), गौंडदार, मवाद युक्त, क्षीण, मूत्र मल रंग वाला, अथवा छीछड़ेदार, काले रंग का, असाध्य होते हैं।
शुद्ध शुक्र-
स्फटिकाम् द्रवं सिगंधं मधुरं मधुगन्धं च।
शुक्रमिच्छान्ति केचित् तु तैलक्षौद्रनिभं तथा॥
सुश्रुत - २/१३
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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