इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंमें भी होगी। जिस समय सूर्य उत्तरायण होता है अर्थात् सूर्य की कलाओं में वृद्धि होने लगे तभी चन्द्र की कलाओं में भी विशेषता आने लगती है। जब चन्द्र की कलाओं में विशेषता होगी तो वीर्य भी विशेषता युक्त हो जाता है।
'तथा शुक्ल पक्ष का नाम 'देव' और कृष्ण पक्ष का नाम 'असुर' है। तथा उत्तरायण की 'देव' संज्ञा और दक्षिणायन की 'असुर' संज्ञा है।'
ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका ग्रन्थप्रामाण्यप्रामाण्य विषय
सूर्य की कलाओं के क्षय और वृद्धि से छः ऋतुएँ बनती हैं। तीन उत्तरायण की वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा। और तीन दक्षिणायन की शरद, हेमन्त और शिशिर। बसन्त ऋतु के आरम्भ से सूर्य उत्तरायण होकर कलाओं में वृद्धि को प्राप्त होता है। जब किसी में किसी प्रकार की वृद्धि होती है तो उसका प्रथम प्रभाव उसकी वृद्धि पर होता है। इसी प्रकार सूर्य की प्रथम वृद्धि कला का विशेष प्रभाव वृद्धि पर ही पहुँचा। इस प्रकार जो मनुष्य अपनी सन्तान को ब्रह्मवर्चसी वेदज्ञ और तीक्ष्ण बुद्धि की बनाना चाहते हैं तो वह वसन्त ऋतु में गर्भाधान करें। जो मनुष्य चाहते हैं कि हमारी सन्तान श्री और यश से परिपूर्ण और राजश्री को प्राप्त करने वाली बलवान क्षत्रिय हो तो वह ग्रीष्म ऋतु में गर्भाधान करें। जो मनुष्य चाहते हैं कि हमारी सन्तान पशुधन, वारिण्य और धन के संग्रह करने में चतुर, वैश्य वृत्ति में पूर्ण योग्य हो तो उन्हें चाहिए कि वह वर्षा ऋतु में गर्भाधान करें।
जिस प्रकार गर्भाधान के लिए उत्तरायण परम श्रेष्ठ है उसी प्रकार मास का शुक्ल पक्ष भी परम श्रेष्ठ है।
पारिवारिक असन्तोष की धधकती ज्वालायें भयंकर परिणाम उपस्थित कर बड़े से बड़े वंश को ध्वस्त कर देती हैं। कहीं पिता पुत्र में असन्तोष है तो कहीं भाई-भाई और भाई-बहिन में। जिसका
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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