इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसी बीच बादशाह ने अहंकार सहित दरबारियों की ओर देखते हुए कहा- 'मेरे विचार में इससे भयंकर शेर संसार में दूसरा न होगा।'
दरबारियों की गर्दनें हिलने लगीं 'बेशक सही फरमाते हैं जहाँपनाह', आदि-आदि स्वर चहूँ और से सुनाई देने लगे। केवल यशवन्तसिंह चुप थे। जब सम्राट ने उनकी ओर देखा तो हँस दिये। सम्राट को भाल पर रेखायें पड़ गयीं, अपना अपमान समझ वह और क्रुद्ध हुआ। परन्तु वह कर ही क्या सकता था? वह तो स्वयं यशवन्तसिंह से घबराता था। अपनी मुद्रा को सँभाल बनावटी हँसी हँस कर कहने लगा 'क्यों? आप हँसे क्यों? क्या आप इसे भयंकर शेर नहीं मानते?'
'सम्राट! यह तो एक साधारण सिंह है ऐसे सिंहों से हमारे बच्चे खेलते हैं।' ईष्या के साथ बादशाह ने कहा 'ओह!'
'जी ही! यदि आशा हो तो मैं भी अपना सिंह दिखाऊँ।' ही अवश्य दिखाओ। कल उसे दरबार में अपने साथ लाना, तुम्हारे शेर और हमारे शेर की कुश्ती होगी। देखें कौन जीतता है। कुश्ती की ललकार स्वीकार कर यशवन्तसिंह बैठ गये।
दरबार समाप्त हुआ, यशवन्तसिंह घर गये उसी समय पुत्र पृथ्वीसिंह पाठशाला से पढ़कर आया। यशवन्तसिंह ने कहा 'बेटा कल दरबार देखने चलोगे' पृथ्वीसिंह ने प्रसन्न होकर कहा 'हाँ पिताजी मैं कल दरबार देखने अवश्य चल्गूंगा।'
पृथ्वीसिंह और दिनों की अपेक्षा आज दरबार जाने की प्रसन्नता में नित्य कर्मों से शीघ्र ही निबट कर तैयार हो गया।
अगले दिन दरबार और दिनों की अपेक्षा दर्शकों से अधिक भरा हुआ है। क्योंकि दरबार में सिंह की कुश्ती होने का समाचार सारे में फैल गया था। सम्राट के सिंह का पिंजरा दरबार में उपस्थित है, सभी दर्शकों को दीख रहा है। परन्तु सबकी लालायित दृष्टियाँ यशवन्तसिंह तथा उसके सिंह के आने की
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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