भारतकोश
इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 250 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 161

प्रतीक्षा में लगी हुई हैं। कुछ ही क्षणों के पश्चात् यशवन्तसिंह अपने प्रिय पुत्र पृथ्वीसिंह को साथ लिए दरबार में उपस्थित हुए। सबकी दृष्टि यशवन्तसिंह और उनके साथ बालक पर पड़ी, परन्तु सिंह को किसी ने नहीं देखा। सिंह को साथ न देखकर उपहास और व्यंग के साथ शाहंशाह कहने लगे 'कहिए! आपका शेर कहाँ रह गया?' क्या हमारे शेर से डर गया? खुशामदी लोगों ने साथ दिया। परन्तु यशवन्तसिंह पर इस उपहास का कोई प्रभाव न पड़ा। वह मुस्कराते हुए कहने लगे- 'मेरा सिंह मेरे पास है।' सब चौंक उठे। सम्राट ने आश्चर्य से कहा- 'कहाँ है?' यशवन्तसिंह ने मधुर स्वर में कहा- 'मेरे पास बैठा है। खुशामदी दरबारी- 'यह शेर!' कहकर हँसने लगे, साथ में औरंगजेब भी खूब हँसा और कहने लगा- 'यशवन्तसिंह तुमको क्या हो गया? कहाँ यह भयंकर शेर कहाँ एक दूध पीता बालक।' परन्तु यशवन्तसिंह चुप रहे।

बच्चा पिता के संकेत को समझ गया। तत्काल ही बच्चे के हृदय में रजपूती वीरता उनड़ पड़ी, भुजाएँ फड़कने लगीं। और मुखड़े पर लालिमा छटकने लगी। उसी क्षण पृथ्वीसिंह अपने पिता की तलवार म्यान से निकाल सिंह की ओर बढ़ा। पुत्र को सिंह की ओर बढ़ता देखकर यशवन्तसिंह ने कहा- 'बेटा! निःशस्त्र पर शस्त्र लेकर सामने जाना क्षत्रियों का धर्म नहीं।' पिता का वचन सुनते ही बच्चे ने पुत्रा तलवार छोड़ खाली हाथ ही पिजरे की ओर बढ़ा। पिजरा खोल कर राजपूत सिंह का बच्चा उस हिंसक सिंह से भिड़ गया। तत्काल ही उस यशवन्तसिंह सुत ने अहंकारी यवनिक शासक सिंह के जबाड़े को पकड़ कर चीर दिया।

पाठको क्या यशवन्तसिंह ने अपने बच्चे को पहले से ही सिंह से कुश्ती लड़ने का अभ्यास करा रखा था? या दरबार में कुश्ती की चुनौती को स्वीकार कर कुछ दिन का अवकाश लेकर लड़ना सिखाया था? नहीं-नहीं! सिंह की कुश्ती अगले ही दिन थी। परन्तु यशवन्तसिंह ने अपने पुत्र को गर्भाधान से ही सिंह

इच्छानुसार सन्तान

१५५

वीरेन्द्र गुप्त:

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri