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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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को ग्रहण करैगा। पिता के अधिक समझाने पर उसने कहा- 'मेरे कुछ प्रश्न हैं उनका समाधान हो जाने पर मैं मुसलमान नहीं बर्नुंगा। पिता ने अनेक विद्वान पण्डितों को बुलाकर लड़के की शंकाओं का समाधान कराया, परन्तु वह सन्तुष्ट न हुआ। तब फिर लड़के ने पिता से कहा- 'मुझे स्वर्ग में जाना है, संसार में ऊँचा उठना है। यह सब मुसलमान बनने से ही हो सकेगा, हिन्दू रहने से नहीं।' पिता ने कहा- 'एक सप्ताह और छहरो।'

एक दिन सार्यकाल समय सेठ जी दुकान पर बैठे थे उस समय एक सन्यासी ने आकर सेठ जी से भोजन की पिशा माँगी। सेठ जी ने सन्यासी को घर ले जाकर भोजन तैयार कराया। सेवक भोजन लेकर आया और सन्यासी के सामने रखकर चला गया। इसी बीच में सन्यासी ने सेठ की मुद्रा देखी फिर सामने भोजन तैयार करते हुए सेठानों को तथा सेवक को भी, यही तक भवन की चाहर दीवारी को भी उदास, चिन्तित और खिन्न देख ऐसा अनुभव होता था कि भवन में चहुँ और दीवारों से औसू टपक रहे हों। यह दृश्य देखकर सन्यासी कम्पित हो उठा और मन ही मन कहने लगा- 'कि हम सन्यासियों का यह कर्तव्य नहीं कि भोजन माँगें और खाकर चले जायें। परन्तु हमारा यह भी कर्तव्य है कि हम गृहस्थियों के कष्ट को सुनें और उसे दूर करने का भरसक प्रयत्न करें।' यह सब विचार कर और अपने ऊपर इस कर्तव्य पालन का भार समझते हुए सन्यासी ने सेठ जी से इस अशान्त वातावरण का कारण जानना चाहा। सेठ जी ने उत्तर दिया- 'महाराज यह सब गृहस्थ के धन्धे हैं आप तो भोजन पाइये।' सन्यासी ने कहा- 'सेठ जी जब तक आप इसका कारण नहीं बतायेंगे मैं भोजन नहीं पाऊँगा।' लाचार हो सेठ जी ने पुत्र को मुसलमान होने की सारी व्यथा सुनाई। सुनकर सन्यासी ने कहा 'सेठ जी आप लड़के को बुलावायें और यह भोजन उठवा लीजिये। मैं अब भोजन तब पाऊँगा जब आपके पुत्र को पुनः

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri