भारतकोश
इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 250 में से

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आपके चरणों में न ला दूँ। लड़के और सन्यासी की बातोंलाप हुई। सन्यासी ने अनेक युक्तियाँ देकर लड़के को समझाया, परन्तु वह कुछ न समझा। यह देखकर सन्यासी ने एक प्रश्न लड़के के सामने रखा 'देखो बच्चा एक नदी है उसके पार एक व्यक्ति खड़ा है और एक इस ओर खड़ा है दोनों में संकेतों से बातचीत हो रही है, और दोनों ही एक दूसरे की बात का अर्थ उल्टा लगा रहे हैं। तो यह बताओ दोनों में किस प्रकार बातचीत हो।' लड़के ने कहा, 'दोनों में से किसी को तैर कर एक ही किनारे पहुँचकर बातचीत करनी चाहिए।' सन्यासी ने कहा- 'बस मेरे और तुम्हारे बीच यही अन्तर है।' लड़के ने कहा- 'यह बात मेरी समझ में नहीं आई।' सन्यासी ने कहा- 'देखो बेटा! तुम तो कोरे अरबी, फारसी के विद्वान् हो और मैं संस्कृत का, अब तुम्हें बताओ हम दोनों एक दूसरे की बात को कैसे समझ सकते हैं जब तक दोनों एक भाषा को न जानते हों। देखो मैं तो वृद्ध हूँ इस कारण अरबी आदि पढ़ने में अधिक समय लगेगा, और तुम युवक हो, तुम्हारी पढ़ने में रुचि भी है इस कारण तुम पहले संस्कृत भाषा पढ़ो।'

सन्यासी ने लड़के को संस्कृत पढ़ाना प्रारम्भ कर दी। और अपने लिए अन्य स्थानों से भिक्षा लेकर उदर पूर्ति करने लगे। अपनी तीव्र बुद्धि की कुशलता के कारण लड़के ने कुछ ही समय में संस्कृत भाषा की योग्यता प्राप्त कर ली। सन्यासी ने जब यह देखा कि वह संस्कृत में भली प्रकार चलने लगा है, तो एक दिन उसके सामने संस्कृत का एक वाक्य 'आपः' रखा और कहा कि इसका अर्थ बताओ। लड़के ने शीघ्र ही उत्तर दिया 'आपः' का अर्थ जल होता है। सन्यासी ने कहा- 'क्या इसका और कोई अर्थ हो सकता है' लड़के ने कहा- 'स्वामी जी मेरी समझ में तो इसका अर्थ और कोई नजर नहीं आता।' सन्यासी ने कहा 'बेटा! इस आपः शब्द के अनेक अर्थ हैं, जैसे आपः का अर्थ है अक्षिति (जो कभी क्षीण न होता हो) यज्ञ, वीर्य, प्राण,

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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