इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रद्धा, शान्ति, रस, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, जल, वायु, विद्युत और यहाँ तक ही नहीं संस्कृत साहित्य में कहा है 'आपः सर्वे देवाः वसन्ति'। लड़का सुनता रहा और मन ही मन कहने लगा कितनी अपार विद्या है। सन्यासी ने फिर एक निम्नलिखित वेद मन्त्र रखा और कहा कि इसका अर्थ करो।
स पय्यंगाच्छृङ्गकमकायमव्रणमस्नाविर श्च शुद्धमपाविद्धम्।
कविर्मनीषि परिभूः स्वयम्भूयाथातथ्यतोऽथान्
व्यदधाच्छारवतीभ्यः समाभ्यः ॥
यजुर्वेद ४०/८
लड़के ने मन्त्र पढ़ा और उस पर विचार किया, कुछ समझ में न आया। तब लड़के ने कहा 'गुरु जी अब इस पर कल विचार होगा।' रात्रि को चारपाई पर पड़े-पड़े लड़का वेद मन्त्र के अर्थ पर विचार करने लगा। वह उसमें इतना तल्लीन हो गया कि उसे रात्रि के व्यतीत होने का अनुभव ही नहीं हुआ। चारपाई से उठा तो उसके चेहरे पर प्रसन्नता, आनन्दमयी विलक्षणता प्रतीत हो रही थी। उसके मुख को देखने से ऐसा आभास होता था कि मानो इसे कोई विलक्षण वस्तु प्राप्त हुई हो।
प्रातः कालिक नित्य कर्म से निवृत्त हो अत्यन्त हर्ष के साथ सन्यासी के सामने आकर नत मस्तक हो कहने लगा 'गुरुजी आज मेरी समस्त शंकाओं का समाधान हो गया, अब मुझे वह मजहब मिट्टी के ढेर के समान दीखता है। मैं अब कभी भी मुसलमान नहीं बर्नुंगा।'
गुरुजी मैंने अपने माता पिता को जो कष्ट दिया है वह अनजाने का था इसमें मेरा कोई दोष नहीं। क्योंकि! मुझे मेरा धर्म नहीं बताया गया था इस कारण मैं कुछ भी अपने धर्म से तुलना न कर सका। वह कहावत सत्य है 'एक ओर की बात गुड से भी अधिक मीठी होती है।' सो वही हुआ।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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