इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंन देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मूरामये। भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावोहि कारणम्॥
चाणक्य नीति ८/११
अर्थ- देवता काठ में नहीं है न पत्थर में है, न मिट्टी की मूर्ति में है, देवता भाव ही में विद्यमान है, इस हेतु भाव ही सबका कारण है।
देवदत्तां पतिभ्यां विन्दते नेच्छात्तमनः। तां साध्वीं विभुयान्नित्यं देवानां प्रियमाचरन्॥
मनु ९/१५
अर्थ- देवतां की दी हुई भार्या को पति पाता है कुछ अपनी इच्छा से नहीं, इसलिये देवतां का प्रियाचरण करता हुआ उस सती का नित्य-पालन करे।
मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसन्धितम्। दम्यत्योः कलाहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥
चाणक्य नीति ३/२१
अर्थ- जहाँ मूर्ख नहीं पूजे जाते, जहाँ अन्न संचित रहता है, और जहाँ स्त्री-पुरुष में कलाह नहीं होता, वहाँ लक्ष्मी स्वयं विद्यमान रहती है।
स्त्री (वज्र) तलवार के समान है। यदि तलवार को म्यान में सुरक्षित रखने के समान स्त्री को भी सुरक्षित रूप से उचित व्यवहार, कर्तव्य और अधिकारों के साथ गृह में रखा जाय तो वह भी तलवार के समान समय पर अपनी तथा परिवार की रक्षा का साधन होती है और अपना सहारा भी होती है। यद्यपि उसे अरक्षित रखा जाय तो वह रखने वाले की ही घातक हो जाती है।
पितृभिर्घ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवैरस्तथा। पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याण मीप्सुभिः॥
मनु ३/५५
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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