इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्थ- यदि स्त्री पुरुष पर रुचि न रखे वा पुरुष को प्रहर्षित न करे तो अप्रसन्नता से पुरुष के शरीर में कामोत्पत्ति कभी न होकर सन्तान नहीं होती और यदि होती है तो दुष्ट होती है।
स्त्री पुरुष का मन से, वचन से और कर्म से कभी भी अपमानित न करे, इसी प्रकार पुरुष भी स्त्री का मन, वचन और कर्म से अपमानित न करे।
अनतावृतुकाले च मन्त्रसंस्कारकृत्यतिः।
सुखस्य नित्य दातेह परलोकं च योषितः॥
मनु ५/१५३
अर्थ- मन्त्र संस्कार (विवाह) करने वाला पति ऋतु और अनुतु में सुख देने वाला है, उसकी सेवा से यहाँ और परलोक में भी सुख प्राप्त होता है।
न दानैः शुध्यते नारी नोपवासशत्रैरपि।
न तीर्थं सेवया तद्भ्यदतुः पादोदकैर्यथा॥
चाणक्य नीति १७/१०
अर्थ- न दानों से, न सैकड़ों उपवासों से न तीर्थ के सेवन से, स्त्री वैसी शुद्ध होती है, जैसी स्वामी के चरण सेवा से अर्थात् पति सेवा से।
अशीलः कामवृत्ता वा गुणैर्वा परिर्वजितः।
उपचर्यः स्त्रिया साध्या सतत देववत्पतिः॥
मनु ५/१५४
अर्थ- पति शील रहित कामी तथा विद्यादि गुणों से हीन भी हो तथापित अच्छी स्त्री को देववत् आराधन योग्य है।
नास्ति स्त्रीणां पृथयज्ञो न व्रत नाप्यपोषिताम्।
पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गं महीयते॥
मनु ५/१५५
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri