इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 206, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्थ- अनीति से अर्जित धन दस वर्ष पर्यन्त ठहरता है, और ग्यारहवें वर्ष के प्राप्त होने पर मूल सहित नष्ट हो जाता है। अर्थात् अन्याय का धन थोड़े ही दिन रहता है।
बिना श्रम किये कुछ भी खाना महान पाप है।
बिना श्रम अथवा बिना मूल्य की मिली खीर से अपने श्रम का रूखा - सूखा टुकड़ा अति श्रेष्ठ है।
अनावश्यक वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा रखना पाप है।
द्वारम्भसि निवेष्ट व्योगले वृद्धा दृढां शिलाम्।
धनवन्त मदातारम् दरिद्रव्या तपस्विनम्॥
बिदुर
अर्थ- दो व्यक्तियों को गले में भारी शिला बाँध कर पानी में डुबो देना चाहिये। १- जो धनवान होकर दानी नहीं है। २- जो गरीब होकर तपस्वी अर्थात् दुःख सहन करने की सामर्थ्य नहीं रखता और पुरुषार्थी भी नहीं।
नमस्या मो देवान् ननु हत विधेस्तेऽपि वशगा,
विधि वन्धीः सोऽपि किं प्रति नियत कर्मैक फलदः।
फलं कार्यायत यदि किं म मरैः किं च विधिना,
न मस्तु कर्मभ्यो विधि-रपिन मेभ्यः प्रभवति॥
भर्तहरि
अर्थ- हम देवताओं को नमन क्यों करें। किन्तु वह भी कठोर विधि के हाथ में हैं। तो विधि को वन्दना करनी चाहिये, किन्तु विधि भी हमारे नियत कर्म के अनुसार फल देती है। यदि फल कर्मों के अधीन है तो फिर क्या देवताओं से क्या विधि से प्रयोजन, इस लिये हम इन कर्मों को ही नमन करते हैं जिन पर विधि का कोई प्रभाव नहीं है अर्थात् कर्म स्वतन्त्र है।
एकं हन्यानवां हन्यात् इषुर्मुक्तो धनुष्यता।
बुद्धि बुद्धिमतोत्सृष्टा राष्ट्रं हन्यात्स राजकम्।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri