इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री वीरेन्द्र गुप्तः
संदर्भ जाति के उन्नायक
(गुप्तः, अब तो उजागर हैं, 'गुप्तः' की परिधि सीमा से बाहर)
भूषण कुल के कुल भूषण तुम
तुमने वह दीप जलाया है
जिसके प्रकाश में स्वजाति ने
निर्मल गौरव पाया है।
तुम धन्य हुए हम सुखी हुए
साहित्य तुम्हारा पढ़ करके।
जीवन क्या हो, यह कैसा हो,
यह सब है, अपने हाथों में
परिवार की वृद्धि कैसी हो
विस्तार सहित बतलाया है।
संतान हमारी कैसी हो
वह देव बने या दनुज बने
तन स्वस्थ रहे मन रहे निर्मल
अविरल गंगा की धार बने।
परमार्थी हो शुचि जीवन भी
स्व कर्म रूप दर्शाया है।
सुकुमार हृदय का नमन 'वीर'
स्वीकारो तुम, मैं धन्य बन्ने,
तेरे पथ पर ही चलने को
मन को अपने समझाया है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri