इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थ- यदि (तू) सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है (तो भी) ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापों को अच्छी प्रकार तज सकेगा।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्त्वयं योगससिद्धः कालेनास्मिन् विन्दति॥
गीता ४/३८
अर्थ- इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह (कृष्ठ) भी नहीं है उस ज्ञान को कितने काल से अपने आप समतत्त्वबुद्धि रूप योग के द्वारा अच्छी प्रकार शुद्धात्मः कारण हुआ पुरुष (अपने आपको शुद्ध) आत्मा (के रूप में) अनुभव करता है।
ईश्वर आराधना से धर्म, धर्म से ज्ञान, ज्ञान से सुकर्म, और सुकर्मों से प्रारब्ध (भाग्य) बनता है। फिर तो पूरा विश्वास हो जाता है कि मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। इसलिए अच्छे कर्म करना ही मनुष्य का धर्म है।
पावमानीर्यो अध्येत्युषिभिः सम्भूतं रसम्।
तस्मै सरस्वती दुहे क्षीरं सर्पिर्मधुदकम्॥
ऋग्वेद ९/६७/३२
अर्थ- जो ऋषियों द्वारा सम्पादित, ज्ञानमय अन्तःकरण को पवित्र करने वाली ज्ञानमयी ऋचाओं का अध्ययन करता है, वेदवाणी और ज्ञानमय प्रभु उसको दूध घी, मधु, जल के तुल्य ऐश्वर्य, बल आनन्द और अभ्युदय प्रदान करता है।
य स्वाध्यायमधीतेशब्दं विधिना नियतः शुचिः।
तस्य नित्यं क्षारत्वेष पयो दधि घृतं मधु॥
मनु २/१०७
अर्थ- जो पुरुष एक वर्ष पर्यन्त विधियुक्त नियम से पवित्र हांकर स्वाध्याय करता है (पढ़ता है) उसके लिए वह (स्वाध्याय) दूध, दही, घी और मधु को वर्षाता है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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