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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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कर्म प्रधान विश्व रचिराखा

विश्वपति ने कर्म को ही प्रधान माना है, जो जैसे कर्म करता है वैसे ही फल पाता है।

विद्या के सूर्य प्रज्ञा चक्षु श्री दण्डी गुरु विरजानन्द जी के माता-पिता बचपन में ही स्वर्ग सिधार गये थे। इनके ५ वर्ष की आयु में चेचक निकली जिस कारण इनके नेत्र जाते रहे। स्वभाव तेज होने के कारण भाई-भावज से रुष्ट होकर १४वर्ष की आयु में घर से निकल गये। ४ वर्ष तक देशाटन करते रहे। इस भ्रमण से अनुभव हुआ कि बिना ज्ञान के मनुष्य पशु समान है, इसलिए विद्या पढ़कर ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। विद्या प्राप्ति के लिए गुरु की खोज में लगे। यत्न करने पर भी जब कोई अच्छा गुरु नहीं मिला तब चिढ़कर अपने स्वभाव के कारण विद्याध्ययन का दृढ़ संकल्प करके बस्ती से दूर गंगा किनारे बैठ गये।

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/१

वह मेरा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो।

संकल्पमूलः कर्मावै यज्ञः संकल्पभवाः।

ब्रतानि यमधर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः॥

मनु २/३

अर्थ- (अमुक कर्म से यह इष्ट फल प्राप्त होगा, इसको संकल्प कहते हैं। फिर जब पूरा विश्वास होता है तब) संकल्प से उसके करने की इच्छा होती है, यथादि सब संकल्प ही से होते हैं। और व्रत, नियम, धर्म ये सब संकल्प ही से होते हैं।

अर्थात् संकल्प बिना कुछ नहीं होता।

सायंकाल के समय एक सन्यासी उधर से निकला उसने इस बालक को एक वृक्ष के नीचे बैठे देखा, चेहरे पर तेज चमक रहा था। सन्यासी ने मन में कहा, मालूम होता है कि यह बालक होनहार विद्वान् होगा। सन्यासी ने बालक से इस तरह एकान्त में इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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