इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रयोग में न आने वाली मशीन जंग लगकर बेकार हो जाती है। इसी प्रकार फेफड़े का निचला भाग बिगड़ने लगता है जिस कारण सबसे भयंकर रोग क्षय (टी॰बी॰) हो जाती है। फेफड़े के गल जाने को ही क्षय (टी॰बी॰) कहते हैं। दूसरे हमारी आयु श्वासों पर आधारित है। नित्य के कार्यों में जैसे भागना, अधिक परिश्रम का कार्य करना, सोना, मैथुन आदि में स्वभाविक श्वैसों की अपेक्षा अधिक श्वैसों का व्यय होता है। उसकी पूर्ति करने के लिए प्राणायाम करना आवश्यक है। प्राणायाम से तेज, बल, स्मृति भी प्राप्त होती है इसलिए प्रत्येक मनुष्य को नित्य कम से कम ३ प्राणायाम तो अवश्य ही करने चाहिए। यदि इससे अधिक करें तो और भी उत्तम है। नित्य प्राणायाम के अभ्यासी को फेफड़ों का कोई भी भयानक रोग नहीं लगता; प्राणायाम से क्षय (टी.बी.) श्वैस रोग, नजला जुकाम आदि अनेक रोग शरीर से दूर रहते हैं और शरीर पुष्ट रहता है।
प्रथम श्वैस को तीव्रगति से बाहर फेंकना और बाहर ही रोकना और पुनः गहरा श्वैस तीव्रगति से भीतर खींचकर रोकना। जब दम घुटने लगे तो धीरे-धीरे श्वैस को बाहर निकालना। यह एक प्राणायाम हुआ, श्वैस को बाहर निकालने को रेचक कहते हैं और श्वैस को बाहर ही रोकने को रेचक कुम्भक कहते हैं। श्वैस को अन्दर खींचने को पूरक कहते हैं और श्वैस को अन्दर ही रोकने को पूरक कुम्भक कहते हैं। श्वैस खींचने में जितना समय लगे उससे चौगुना रोकने में, और उससे दुगुना श्वैस को बाहर छोड़ने में लगाना चाहिए।
शरद ऋतु में भत्रिका प्राणायाम करने से ठण्ड का विकार नहीं होता और फेफड़े सुदृढ़ होते हैं। भत्रिका प्राणायाम श्वैस को तीव्रगति के साथ लेना और छोड़ना। जैसे बाजे की धौकनी निरन्तर बिना रुके चलती है उसी प्रकार श्वैस बिना रोके जल्दी जल्दी लम्बे खींचना और छोड़ना।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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