इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राणायाम के अनेक भेद हैं जिन्हें समझने के लिए किसी योग्य शिक्षक की आवश्यकता है। परन्तु प्रत्येक व्यक्ति को योग्य शिक्षक मिल जाय, यह सम्भव नहीं। इसी कारण अधिकांश व्यक्ति प्राणायाम के लाभ से वंचित रह जाते हैं। शुद्ध खाद्य पदार्थों के अभाव में मानव की जठराग्नि दिन प्रतिदिन क्षीण होती जा रही है जिसके कारण से मानव में 'वात और कफ' सम्बन्धी रोग बढ़ते चले जा रहे हैं। शरीर में ऊष्मा कम होने पर ही शरीर शिथिल होने लगता है। शरीर की ऊष्मा को सही अनुपात में स्थित रखने के लिए हमारे योगियों ने 'भस्त्रिका' प्राणायाम करने की व्यवस्था दी है, जिसके द्वारा शरीर में ऊष्मा उचित मात्रा में उत्पन्न होकर जठराग्नि को बलिष्ठ बनाता है और जठराग्नि के बलिष्ठ होने से पाचन क्रिया सही होती है, पाचन क्रिया सही होने से भोजन का रस उत्तम बनता है और उत्तम रस से शरीर की सभी धातुएँ पुष्ट होकर शरीर निरोगी बनता है और 'वात-कफ' सम्बन्धी समस्त रोगों से मुक्ति पाता है। 'भस्त्रिका' प्राणायाम को प्रत्येक व्यक्ति बड़ी सुामता से घर बैठे कर सकता है, यह प्राणायाम कई प्रकार से होता है उसके कुछ प्रकार हम यहाँ प्रस्तुत करते हैं।
१- पद्यासन या सुखासन में बैठ कर अपने दाहिने हाथ का अंगूठा नासिका को दाहिनी ओर रखें और बाँच की दो अंगुलियाँ नासिका के बायीं ओर रखें पहले अंगुलियों से बायें नथने को दबा कर बन्द करें और दाहिने नथने से लम्बा श्वास खींच कर अंगूठे से दबा कर बन्द करें बायें नथने से अंगुलियाँ हटाकर श्वास को लम्बाई के साथ बाहर छोड़ें, जब पूरा श्वास बाहर निकल जाये तो उसी नथने से श्वास खींचें। इसी प्रकार जिस नथने से श्वास खींचा है उससे दूसरे नथने से श्वास छोड़ें और जिससे श्वास छोड़ी है उसी से श्वास खींच कर दूसरे नथने से छोड़ें। इसी प्रकार इस क्रिया को करते रहना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार क्रिया को तीव्र करते रहें और पहले २ मिनट से अध्यास
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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