भारतकोश
इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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लगते हैं। युवक पच्चीसवें वर्ष में पूर्ण यौवन को प्राप्त होते हैं और युवतियाँ सोहलवें वर्ष में पूर्ण यौवन को प्राप्त होती हैं। क्योंकि शरीर में समस्त धातुओं, वीर्य आदि की उत्पत्ति होती है। ज्यों-ज्यों वीर्य परिपक्व होता जाता है त्यों-त्यों शरीर सर्वांग सुन्दर और सुदृढ़ होता जाता है, मुख पर लालिमा प्रकट होने लगती है, यहाँ तक कि पूर्ण युवाकाल पर पहुँच कर तेज, बल और सौन्दर्य बस देखने योग्य होता है।

ऋषि दयानन्द सरस्वती ने अपने सत्यार्थ प्रकाश के तीसरे समुल्लास में ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार बताये हैं।

१. निकुष्टतम- २५ वर्ष का युवक और १६ वर्ष की युवती।

२. मध्यम- ३६ या ४० वर्ष का युवक और १८ या बीस वर्ष की युवती।

३. श्रेष्ठतम- ४८ वर्ष का युवक और २४ वर्ष की युवती।

स्मरण रहे कि यह विशेषता अविवाहित होने से नहीं मिलती, वरन् वीर्य रक्षा करने से (अक्षत् वीर्य और अक्षत् योनि) होने से ही मिलती है।

यह समय बड़ा ही विकट और चंचल है। इसी में युवक और युवतियों को अपने ब्रह्मचर्य व्रत की परीक्षा देनी पड़ती है मदन की तरंगों को हटाना बड़ा कठिन कार्य है। यदि इस कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये और वीर्य के उबलते हुए वेग को पूर्ण रक्षा यथावत् कर सके तो फिर मनुष्य नहीं वरन् देवता है। ऐसे युवक और युवतियाँ हर कहीं आदरणीय और पूज्य होते हैं।

परन्तु शोक है कि भारतवर्ष के ऐसे भाग्य कहीं! दुःखाचारी जनों की गोष्ठियाँ दुष्ट प्रभावों और निशिदिन बढ़ने वाले कूटवों ने हमारे देश का सर्वनाश कर दिया। जैसे युवाकाल से पूर्व ही विवाह का हो जाना, खोटी संगत में पड़ कर हस्त मैथुन तथा गुदा मैथुनादि करना कराना। इन्हीं कूटवों के कारण आज भारत रसातल को जा रहा है। हे भारत के युवकों! युवतियों, आप ही के

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वारेन्द्र गुप्तः

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