इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजब बीज और भूमि अर्थात् स्त्री और पुरुष दोनों के रजः और वीर्य समान पुष्ट होते हैं तभी श्रेष्ठ सन्तान की उत्पत्ति होती है और जिस वीर्य में सन्तानोत्पादक कीट अर्थात् जीव नहीं होता उस वीर्य से गर्भाधान नहीं हो सकता या वीर्य में जीव भी हो परन्तु वीर्य पुष्ट न हो या स्त्री का रजः पुष्ट न हो तो भी गर्भ नहीं रहेगा। इसीलिए रजः और वीर्य का पुष्ट होना तथा वीर्य में जीव का होना ही उत्तम गर्भाधान के लक्षण हैं।
आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा।
स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः॥
छांदोग्य उपनिषद् ७/२५/२
अर्थ- जब मनुष्य का आहार शुद्ध हो जाता है, तो स्मृति अटल हो जाती है और जब स्मृति पक्की हो जाती है, तब सारी गाँठें खुल जाती हैं।
दीपो भक्षयति ध्योतं कज्जलं च प्रसूयते।
यदनन् भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥
चारुण्य नीति ८/३
अर्थ- दीपक अन्धकार को खाता है, और काजल को उत्पन्न करता है। मनुष्य जैसा अन्न नित्य खाता है, वैसी ही उसकी सन्तान होती है।
स यामिच्छेत्कांमयेत मेति तस्यामर्थ निष्ठाय
मुखेन मुखध्वं सधायापस्थमस्या अभिमृशप
जपेदङ्गादङ्गात् संभवसि हृदयादिधियासे।
सत्त्वमङ्गकषायोऽसि दिग्धिविद्वमिव मादयेभामम्॥
बृहदारण्यकोपनिषद् ६/४/९
अर्थ- हमारे अंग-अंग तथा हृदय की नाड़ी-नाड़ी से वीर्य रूपी रस उत्पन्न होता है इसलिए इसको सन्तानोत्पत्ति के उपयोग में ही लाना चाहिए व्यर्थ नष्ट करना उचित नहीं, इसलिए तुम शुभ संकल्प से उत्तम सन्तान का ध्यान करो।
इच्छानुसार सन्तान
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विरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri