ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished548 पृष्ठ
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( १ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ६—९ | जगत्के कारणरूप परब्रह्मका अदितिदेवी, अग्नि और सूर्यके रूपमें वर्णन ..... १३९ | १३९ |
| १०—११ | परमात्माकी सर्वव्यापकता और सर्वरूपताको न जाननेके कारण जो इसे नाना रूपोंमें देखते हैं, उनको बारंबार जन्म-मरणकी प्राप्ति होनेका कथन ..... १४२ | १४२ |
| १२—१५ | हृदय-गुफामें स्थित परमेश्वरको अङ्गुष्ठपरिमाणवाला बताना और उस परमेश्वरके न जानने और जाननेके फलका वर्णन ..... १४३ | १४३ |
( द्वितीय बल्ली )
| १ | परमेश्वरके ध्यानसे शोक-निवृत्ति तथा जीवन्मुक्ति और विदेह-मुक्तिका निरूपण ..... १४६ | १४६ |
|---|---|---|
| २—४ | परमेश्वरकी सर्वरूपता और सर्वत्र परिपूर्णताका प्रतिपादन ..... १४७ | १४७ |
| ५—६ | यमराजद्वारा परमात्माका स्वरूप और जीवात्माकी गति बतानेकी प्रतिज्ञा ..... १४९ | १४९ |
| ७ | जीवात्माकी गतिका प्रकरण ..... १५० | १५० |
| ८—११ | परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन तथा अग्नि, वायु और सूर्यके दृष्टान्तसे परमेश्वरकी व्यापकता और निलैपताका कथन ..... १५१ | १५१ |
| १२—१३ | समस्त प्राणियोंके अन्तर््यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका अपने हृदयमें दर्शन करनेवालेको परमानन्द और परम शान्तिकी प्राप्तिका निरूपण ..... १५४ | १५४ |
| १४ | उक्त परमानन्दकी प्राप्ति किस प्रकार होती है—यह जाननेके लिये नचिकेताकी उत्कण्ठा ..... १५६ | १५६ |
| १५ | यमराजद्वारा परब्रह्मकी सर्वप्रकाशकताका प्रतिपादन ..... १५६ | १५६ |
( तृतीय बल्ली )
| १ | संसाररूप अश्वत्थ-वृक्षका वर्णन ..... १५७ | १५७ |
|---|---|---|
| २ | सबका शासन करनेवाले परमेश्वरके ज्ञानसे अमृतत्व-प्राप्तिका उल्लेख ..... १५८ | १५८ |
| ३ | प्रभुकी सर्वशासकताका प्रतिपादन ..... १५९ | १५९ |
| ४ | मनुष्यशरीरके रहते-रहते परमेश्वरको न जान लेनेसे बारंबार पुनर्जन्म-प्राप्तिका कथन ..... १६० | १६० |
| ५ | स्थान-भेदसे भगवान्के प्राकट्यमें तारतम्य ..... १६० | १६० |