भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

रहित हो जाता है। उसके अन्तःकरणमेंसे हर्ष-शोकादि विकार समूल नष्ट हो जाते हैं*॥ १२॥

एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीयः हि लब्ध्वा विवृतः सच्च नचिकेतसं मन्ये॥ १३॥

मर्त्यः=मनुष्य (जब); एतत्=इस; धर्म्यम्=धर्ममय (उपदेश)-को; श्रुत्वा=सुनकर; सम्परिगृह्य=भलीभाँति ग्रहण करके; प्रवृह्य=(और) उसपर विवेकपूर्वक विचार करके; एतम्=इस; अणुम्=सूक्ष्म आत्मतत्त्वको; आप्य=जानकर (अनुभव कर लेता है, तब); सः=वह; मोदनीयम्=आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; लब्ध्वा=पाकर; मोदते हि=आनन्दमें ही मग्न हो जाता है; नचिकेतसम्=तुम नचिकेताके लिये; विवृतम् सच्च मन्ये=(मैं) परमधामका द्वार खुला हुआ मानता हूँ॥ १३॥

व्याख्या—इस अध्यात्म-विषयक धर्ममय उपदेशको पहले तो अनुभवी महापुरुषके द्वारा अतिशय श्रद्धापूर्वक सुना चाहिये, सुनकर उसका मनन करना चाहिये। तदनन्तर एकान्तमें उसपर विचार करके बुद्धिमें उसको स्थिर करना चाहिये। इस प्रकार साधन करनेपर जब मनुष्यको आत्मस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् जब वह आत्माको तत्त्वसे समझ लेता है, तब आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। उस आनन्दके महान् समुद्रको पाकर वह उसमें निमग्न हो जाता है। हे नचिकेता! तुम्हारे लिये उस परमधामका द्वार खुला हुआ है। तुमको वहाँ जानेसे कोई रोक नहीं सकता। तुम ब्रह्मप्राप्तिके उत्तम अधिकारी हो, ऐसा मैं मानता हूँ॥ १३॥

  • प्रातःस्मरणीय भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने भी ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें इस प्रकरणको परमात्मविषयक माना है ('प्रकरणं चेद परमात्मनः'—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० २ के १२ वें सूत्रका भाष्य)।