भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

प्रतिपादन करते हैं; च=और; सर्वाणि तपांसि=सम्पूर्ण तप; यत्=जिस पदका; वदन्ति=लक्ष्य कराते हैं अर्थात् वे जिसके साधन हैं; यत् इच्छन्तः=जिसको चाहनेवाले साधकगण; ब्रह्मचर्यम्=ब्रह्मचर्यका; चरन्ति=पालन करते हैं; तत् पदम्=वह पद; ते=तुम्हें; (मैं) संग्रहेण=संक्षेपसे; ब्रवीमि=बतलाता हूँ; (वह है) ओम्=ओम्; इति=ऐसा; एतत्=यह (एक अक्षर) ॥ १५ ॥

व्याख्या —यमराज यहाँ परब्रह्म पुरुषोत्तमको परमप्राप्य बतलाकर उसके वाचक अँकारको प्रतीकरूपसे उसका स्वरूप बतलाते हैं। वे कहते हैं कि समस्त वेद नाना प्रकार और नाना छन्दोंसे जिसका प्रतिपादन करते हैं, सम्पूर्ण तप आदि साधनोंका जो एकमात्र परम और चरम लक्ष्य है तथा जिसको प्राप्त करनेकी इच्छासे साधक निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्यका अनुष्ठान किया करते हैं, उस पुरुषोत्तमभगवान्का परमतत्त्व मैं तुम्हें संक्षेपमें बतलाता हूँ। वह है 'अँ' यह एक अक्षर ॥ १५ ॥

सम्बन्ध —नामरहित होनेपर भी परमात्मा अनेक नामोंसे पुकारे जाते हैं। उनके सब नामोंमें 'अँ' सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अतः यहाँ नाम और नामीका अभेद मानकर 'प्रणव' को परब्रह्म पुरुषोत्तमके स्थानमें वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं—

एतद्भ्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्भ्येवाक्षरं परम्।

एतद्भ्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥

एतत्=यह; अक्षरम् एव हि=अक्षर ही तो; ब्रह्म=ब्रह्म है (और); एतत्=यह; अक्षरम् एव हि=अक्षर ही; परम्=परब्रह्म है; हि=इसलिये; एतत् एव=इसी; अक्षरम्=अक्षरको; ज्ञात्वा=जानकर; यः=जो; यत्=जिसको; इच्छति=चाहता है; तस्य=उसको; तत्=वही (मिल जाता है) ॥ १६ ॥

व्याख्या —यह अविनाशी प्रणव—अँकार ही तो ब्रह्म (परमात्माका स्वरूप) है और यही परब्रह्म परमपुरुष पुरुषोत्तम है अर्थात् उस ब्रह्म और परब्रह्म दोनोंका ही नाम अँकार है; अतः इस तत्त्वको समझकर साधक इसके द्वारा दोनोंमेंसे किसी भी अभीष्ट रूपको प्राप्त कर सकता है ॥ १६ ॥