ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् २०१
यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥
एषः=यह (जीवात्मा); यच्चित्तः=जिस संकल्पवाला होता है; तेन=उस संकल्पके साथ; प्राणम्=मुख्य प्राणमें; आयाति=स्थित हो जाता है; प्राणः=मुख्य प्राण; तेजसा युक्तः=तेज (उदान) से युक्त हो; आत्मना सह=अपने सहित (मन, इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको); यथासंकल्पितम्= उसके संकल्पानुसार; लोकम्=भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनिमें; नयति=ले जाता है ॥ १० ॥
व्याख्या—मरते समय इस आत्माका जैसा संकल्प होता है, इसका मन अन्तिम क्षणमें जिस भावका चिन्तन करता है (गीता ८।६), उस संकल्पके सहित मन, इन्द्रियोंको साथ लिये हुए यह मुख्य प्राणमें स्थित हो जाता है। वह मुख्य प्राण उदानवायुसे मिलकर अपने सहित मन और इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको उस अन्तिम संकल्पके अनुसार यथायोग्य भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनिमें ले जाता है। अतः मनुष्यको उचित है कि अपने मनमें निरन्तर एक भगवान्का ही चिन्तन रखे, दूसरा संकल्प न आने दे, क्योंकि जीवन अल्प और अनित्य है, न जाने कब अचानक इस शरीरका अन्त हो जाय। यदि उस समय भगवान्का चिन्तन न होकर कोई दूसरा संकल्प आ गया तो सदाकी भाँति पुनः चौरासी लाख योनियोंमें भटकना पड़ेगा ॥ १० ॥
सम्बन्ध—अब प्राणविषयक ज्ञानका सांसारिक और पारलौकिक फल बतलाते हैं—
य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥
यः विद्वान्=जो कोई विद्वान्; एवम् प्राणम्=इस प्रकार प्राण (के रहस्य) को; वेद=जानता है; अस्य=उसकी; प्रजा=संतानपरम्परा; न ह हीयते=कदापि नष्ट नहीं होती; अमृतः=(वह) अमर; भवति=हो जाता है; तत् एषः=इस विषयका यह (अगला); श्लोकः=श्लोक (है) ॥ ११ ॥