ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 277, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २]
मुण्डकोपनिषद्
२७५
पुरुषकी; सर्वे=सम्पूर्ण; कामाः=कामनाएँ; इह एव=यहीं; प्रविलीयन्ति=सर्वथा विलीन हो जाती हैं॥ २॥
व्याख्या —जो भोगोंको आदर देनेवाला है, जिसकी दृष्टिमें इस लोक और परलोकके भोग सुखके हेतु हैं, वही भोगोंकी कामना करता है और नाना प्रकारकी कामनाओंके कारण ही जहाँ-जहाँ भोग उपलब्ध हो सकते हैं, वहाँ-वहाँ कर्मानुसार उत्पन्न होता है; परंतु जो भगवान्को चाहनेवाले भगवान्के प्रेमी भक्त पूर्णकाम हो गये हैं, इस जगत्के भोगोंसे ऊब गये हैं, उन विशुद्ध अन्तःकरणवाले भक्तोंकी समस्त कामनाएँ इस शरीरमें ही विलीन हो जाती हैं। स्वप्नमें भी उनकी दृष्टि भोगोंकी ओर नहीं जाती। फलतः उन्हें शरीर छोड़नेपर नवीन जन्म नहीं धारण करना पड़ता। वे भगवान्को पाकर जन्म-मृत्युके बन्धनसे सदाके लिये छूट जाते हैं॥ २॥
सम्बन्ध —पहले दो मन्त्रोंमें भगवान्के परम दुलारे जिन प्रेमी भक्तोंका वर्णन किया गया है, उन्हींको वे सर्वात्मा परब्रह्म पुरुषोत्तम दर्शन देते हैं—यह बात अब अगले मन्त्रमें कहते हैं—
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तन्मु स्वाम्॥ ३॥*
अयम्=यह; आत्मा=परब्रह्म परमात्मा; न प्रवचनेन=न तो प्रवचनसे; न मेधया=न बुद्धिसे (और); न बहुना श्रुतेन=न बहुत सुननेसे ही; लभ्यः=प्राप्त हो सकता है; एषः=यह; यम्=जिसको; वृणुते=स्वीकार कर लेता है; तेन एव=उसके द्वारा ही; लभ्यः=प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि); एषः=यह; आत्मा=परमात्मा; तस्य=उसके लिये; स्वाम् तनुम्=अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते=प्रकट कर देता है॥ ३॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें यह बात समझायी गयी है कि वे परमात्मा न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ़-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्म-तत्त्वका
- यह मन्त्र कठोपनिषद्में भी इसी प्रकार है (१।२।२३)।