ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 343, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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संतान, विद्याविषयक संहिताके ज्ञानसे विद्या और ब्रह्मतेज तथा अध्यात्मसंहिताके विज्ञानसे वाक्शक्तिकी प्राप्ति—इस प्रकार पृथक्-पृथक् फल समझना चाहिये। श्रुतिमें समस्त संहिताओंके ज्ञानका सामूहिक फल बतलाया गया है। श्रुति ईश्वरकी वाणी है; अतः इसका रहस्य समझकर ब्रह्मा और विश्वासके साथ उपर्युक्त उपासना करनेसे निस्संदेह वे सभी फल प्राप्त हो सकते हैं, जिनकी चर्चा ऊपर की गयी है।
॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थ अनुवाक
यश्छन्दसामूषभो विश्वरूपः छन्दोभ्योऽध्मृतात् सम्बभूव। स मेन्द्रो मेधया सृणोतु। अमृतस्य देव धारणो भूयासम्। शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः। श्रुतं मे गोपाय।
यः=जो; छन्दसाम्=वेदोंमें; ऋषभः=सर्वश्रेष्ठ है; विश्वरूपः=सर्वरूप है (और); अमृतात्=अमृतस्वरूप; छन्दोभ्यः=वेदोंसे; अधि=प्रधानरूपमें; सम्बभूव=प्रकट हुआ है; सः=वह (ओंकारस्वरूप); इन्द्रः=सबका स्वामी (परमेश्वर); मा=मुझे; मेधया=धारणायुक्त बुद्धिसे; सृणोतु=सम्पन्न करे; देव=हे देव! (मैं आपकी कृपासे); अमृतस्य धारणः=अमृतमय परमात्माको (अपने हृदयमें) धारण करनेवाला; भूयासम्=बन जाऊँ; मे=मेरा; शरीरम्=शरीर; विचर्षणम्=विशेष फुर्तीला—सब प्रकारसे रोगरहित हो (और); मे=मेरी; जिह्वा=जिह्वा; मधुमत्तमा=अतिशयमधुमती (मधुरभाषिणी); [ भूतात् ]=हो जाय; कर्णाभ्याम्=(मैं) दोनों कानोंद्वारा; भूरि=अधिक; विश्रुवम्=सुनता रहूँ; (हे प्रणव ! तू) मेधया=लौकिक बुद्धिसे; पिहितः=ढकी हुई; ब्रह्मणः=परमात्माकी; कोशः=निधि; असि=है; (तू) मे=मेरे; श्रुतम् गोपाय=सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर।