ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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वेदम् अनुच्य=वेदका भलीभाँति अध्ययन कराकर; आचार्यः=आचार्य; अन्तेवासिनम्=अपने आश्रममें रहनेवाले ब्रह्मचारी विद्यार्थीको; अनुशास्ति=शिक्षा देता है; सत्यम् वद=तुम सत्य बोलो; धर्मम् चर=धर्मका आचरण करो; स्वाध्यायात्=स्वाध्यायसे; मा प्रमदः=कभी न चूको; आचार्याय=आचार्यके लिये; प्रियम् धनम्=दक्षिणाके रूपमें वाञ्छित धन; आह्वय=लाकर (दो; फिर उनकी आज्ञासे गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करके); प्रजातन्तुम्=संतान-परम्पराको (चालू रखो, उसका); मा व्यवच्छेत्सीः=उच्छेद न करना; सत्यात्=(तुमको) सत्यसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं डिगना चाहिये; धर्मात्=धर्मसे; न=नहीं; प्रमदितव्यम्=डिगना चाहिये; कुशलात्=शुभ कर्मोंसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं चूकना चाहिये; भूत्ये=उन्नतिके साधनोंसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं चूकना चाहिये; स्वाध्यायप्रवचनाभ्याम्=वेदोंके पढ़ने और पढ़ानेमें; न प्रमदितव्यम्=कभी भूल नहीं करनी चाहिये; देवपितृकार्याभ्याम्=देवकार्यसे और पितृकार्यसे; न प्रमदितव्यम्=कभी नहीं चूकना चाहिये।
व्याख्या—गृहस्थको अपना जीवन कैसा बनाना चाहिये, यह बात समझानेके लिये इस अनुवाकका आरम्भ किया गया है। आचार्य शिष्यको वेदका भलीभाँति अध्ययन कराकर समावर्तन-संस्कारके समय गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके गृहस्थ-धर्मका पालन करनेकी शिक्षा देते हैं—पुत्र! तुम सदा सत्य-भाषण करना, आपत्ति पड़नेपर भी झूठका कदापि आश्रय न लेना, अपने वर्ण-आश्रमके अनुकूल शास्त्र-सम्मत धर्मका अनुष्ठान करना, स्वाध्यायसे अर्थात् वेदोंके अभ्यास, संध्यावन्दन, गायत्रीजप और भगवद्भाम-गुणकीर्तन आदि नित्यकर्ममें कभी भी प्रमाद न करना—अर्थात् न तो कभी उन्हें अनादरपूर्वक करना और न आलस्यवश उनका त्याग ही करना। गुरुके लिये दक्षिणाके रूपमें उनकी रुचिके अनुरूप धन लाकर प्रेमपूर्वक देना; फिर उनकी आज्ञासे गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके स्वधर्मका पालन करते हुए संतान-परम्पराको सुरक्षित रखना—उसका लोप न करना। अर्थात् शास्त्रविधिके अनुसार विवाहित धर्मपत्नीके साथ ऋतुकालमें नियमित सहवास करके संतानोत्पत्तिका कार्य