ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ११
नित्यानित्यवस्तुका विवेक, क्षणभङ्गुर विनाशशील अनित्य ऐहलौकिक और पारलौकिक भोग-सामग्रियों और उनके साधनोंसे पूर्ण विरक्ति, संयमपूर्ण पवित्र जीवन और एकमात्र सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मके चिन्तनमें अखण्ड संलग्नता। इस यथार्थ ज्ञानके अनुष्ठानसे प्राप्त होता है—परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता १८।४९—५५)। यथार्थ ज्ञानका यह सर्वोत्तम फल, ज्ञानाभिमानमें रत स्वेच्छाचारी मनुष्योंको जो दुर्गतिरूप फल मिलता है, उससे सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।
इसी प्रकार सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले कर्मका स्वरूप है—कर्ममें कर्तापनके अभिमानका अभाव, राग-द्वेष और फल-कामनाका अभाव एवं अपने वर्णाश्रम तथा परिस्थितिके अनुरूप केवल भगवत्सेवाके भावसे श्रद्धापूर्वक शास्त्रविहित कर्मोंका यथायोग्य सेवन। इसके अनुष्ठानसे समस्त दुर्गुण और दुराचारोंका अशेष रूपसे नाश हो जाता है और हर्ष-शोकादि समस्त विकारोंसे रहित होकर साधक मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है। सकामभावसे किये जानेवाले कर्मोंका जो पुनर्जन्मरूप फल उन कर्ताओंको मिलता है, उससे इस यथार्थ कर्म-सेवनका यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।
इस प्रकार हमने उन परम ज्ञानी महापुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक्-पृथक्-रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥ १०॥
सम्बन्ध— अब उपर्युक्त प्रकारसे ज्ञान और कर्म—दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट शब्दोंमें बतलाते हैं—
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयँसह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥
यः=जो मनुष्य; तत् उभयम्=उन दोनोंको; (अर्थात्) विद्याम्=ज्ञानके तत्त्वको; च=और; अविद्याम्=कर्मके तत्त्वको; च=भी; सह=साथ-साथ; वेद= यथार्थतः जान लेता है; अविद्यया=(वह) कर्मोंके अनुष्ठानसे; मृत्युम्=मृत्युको; तीर्त्वा=पार करके; विद्यया=ज्ञानके अनुष्ठानसे; अमृतम्=अमृतको; अश्नुते=