भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 548 में से

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पृष्ठ 405

अनु० ९ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

४०३

नवम अनुवाक

सम्बन्ध— आठवें अनुवाकमें जिस श्लोक (मन्त्र)को लक्ष्य कराया गया है, उसका उल्लेख किया जाता है—

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति।

मनसा सह=मनके सहित; वाचः=वाणी आदि समस्त इन्द्रियाँ; यतः=जहाँसे; अप्राप्य=उसे न पाकर; निवर्तन्ते=लौट आती हैं; [ तस्य ] ब्रह्मणः=उस ब्रह्मके; आनन्दम्=आनन्दको; विद्वान्=जाननेवाला (महापुरुष); कुतश्चन=किसीसे भी; न बिभेति=भय नहीं करता; इति=इस प्रकार यह श्लोक है।

व्याख्या— इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके परमानन्दस्वरूपको जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि मनके सहित सभी इन्द्रियाँ उसे न पाकर जहाँसे लौट आती हैं—जिस ब्रह्मानन्दको जाननेकी इन मन और इन्द्रियोंकी शक्ति नहीं है, परब्रह्म परमात्माके उस आनन्दको जाननेवाला ज्ञानी महापुरुष कभी किसीसे भी भय नहीं करता, वह सर्वथा निर्भय हो जाता है। इस प्रकार इस श्लोकका तात्पर्य है।

एतॄः ह वाव न तपति। किमहॄः साधु नाकरवम्। किमहं पापमकरवमिति। स य एवं विद्वान्ते आत्मानॄः सृणुते। उभे द्वौ वैष एते आत्मानॄः सृणुते। य एवं वेद। इत्युपनिषत्।

ह वाव=यह प्रसिद्ध ही है कि; एतम्=उस (महापुरुष)को; (यह बात) न तपति=चिन्तित नहीं करती कि; अहम्=मैंने; किम्=क्यों; साधु=श्रेष्ठ कर्म; न=नहीं; अकरवम्=किया; किम्=(अथवा) क्यों; अहम्=मैंने; पापम्=पापाचरण; अकरवम् इति=किया; यः=जो; एते=इन पुण्य-पापकर्मोंको; एवम्=इस प्रकार (संतापका हेतु); विद्वान्=जाननेवाला है; सः=वह; आत्मानम् सृणुते=आत्माकी रक्षा करता है; हि=अवश्य ही; यः=जो; एते=इन पुण्य और पाप; उभे एव=दोनों ही कर्मोंको;

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