भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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भृगुवल्ली *

प्रथम अनुवाक

भृगुर्वै वारुणिः, वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तस्मा एतत्प्रोवाच। अत्रं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति। तः होवाच। यतो वा इमानी भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्यभिर्संविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।

वै=यह प्रसिद्ध है कि; वारुणिः=वरुणका पुत्र; भृगुः=भृगु; पितरम्=अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके पास गया (और विनयपूर्वक बोला—); भगवः=भगवन्!; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश कीजिये; इति=इस प्रकार प्रार्थना करनेपर; तस्मै=उससे; (वरुणने) एतत्=यह; प्रोवाच=कहा; अत्रम्= अत्र; प्राणम्=प्राण; चक्षुः=नेत्र; श्रोत्रम्=श्रोत्र; मनः=मन; (और) वाचम्=वाणी; इति=इस प्रकार (ये सब ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं), तम् ह उवाच=पुनः (वरुणने) उससे कहा; वै=निश्चय ही; इमानी=ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले; भूतानि=प्राणी; यतः=जिससे; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; येन=जिसके सहारे; जीवन्ति=जीवित रहते हैं; (तथा) प्रयन्ति=(अन्तमें इस लोकसे) प्रयाण करते हुए; यत् अभिर्संविशन्ति=जिसमें प्रवेश करते हैं; तत्=उसको; विजिज्ञासस्व=तत्त्वसे जाननेकी इच्छा कर; तत्=वही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार (पिताकी बात सुनकर); सः=उसने; तपः अतप्यत=तप किया; सः=उसने; तपः तप्त्वा=तप करके—


  • वरुणने अपने पुत्र भृगु ऋषिको जिस ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था, उसीका इस वल्लीमें वर्णन है, इस कारण इसका नाम भृगुवल्ली है।