ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 415, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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उत्तर दिया—‘तू तपके द्वारा ही ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी इच्छा कर। अर्थात् तपस्यापूर्वक उसका पूर्वकथनानुसार विचार कर। तप ही ब्रह्म है।’ इस प्रकार पिताजीकी आज्ञा पाकर भगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह आगे बताया गया है।
॥ पञ्चम अनुवाक समाप्त ॥ ५ ॥
षष्ठ अनुवाक
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्धयेव खलि्वमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिंसंविशन्तीति। सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता। स य एवं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या।
आनन्दः=आनन्द ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार; व्यजानात्=निश्चय-पूर्वक जाना; हि=क्योंकि; खलु=सचमुच; आनन्दात्=आनन्दसे; एव=ही; इमानि=ये समस्त; भूतानि=प्राणी; जायन्ते=उत्पन्न होते हैं; जातानि=उत्पन्न होकर; आनन्देन=आनन्दसे ही; जीवन्ति=जीते हैं; (तथा) प्रयन्ति=इस लोकसे प्रयाण करते हुए; (अन्तमें) आनन्दम् अभिसंविशन्ति=आनन्दमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं; इति=इस प्रकार (जाननेपर उसे परब्रह्मका पूरा ज्ञान हो गया); सा=वह; एषा=यह; भार्गवी=भगुकी जानी हुई; वारुणी=और वरुणद्वारा उपदेश की हुई; विद्या=विद्या; परमे व्योमन्=विशुद्ध आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें; प्रतिष्ठिता=प्रतिष्ठित है अर्थात् पूर्णतः स्थित है; यः=जो कोई (दूसरा साधक) भी; एवम्=इस प्रकार (आनन्दस्वरूप ब्रह्मको); वेद=जानता है; सः=वह; (उस विशुद्ध आकाशस्वरूप परमानन्दमें) प्रतितिष्ठति=स्थित हो जाता है; (इतना ही नहीं; इस लोकमें लोगोंके