भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अनु० १० ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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आवश्यक परिश्रम करना पड़ता है। जिस भावसे वह अतिथिको देता है, उसी भावसे उतने ही आदर-सत्कारके साथ उसे वे वस्तुएँ मिलती हैं। इसी प्रकार यदि कोई अन्तिम वृत्तिसे अर्थात् बिना किसी प्रकारका आदर-सत्कार किये तुच्छ भावसे भाररूप समझकर अतिथिकी सेवा करता है—उसे निकृष्ट भावसे अश्रद्धापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन आदि पदार्थ देता है, तो उसे वे पदार्थ वैसे ही भावसे प्राप्त होते हैं। अर्थात् उनकी प्राप्तिके लिये उसे अधिक-से-अधिक परिश्रम करना पड़ता है, लोगोंकी खुशामद करनी पड़ती है। जो मनुष्य इस प्रकार इस रहस्यको जानता है, वह उत्तम रीतिसे और विशुद्धभावसे अतिथिसेवा करता है; अतः उसे सर्वोत्तम फल, जो पहले तीन अनुवाकोंमें बताया गया है, मिलता है।

सम्बन्ध— अब परमात्माका विभूतिरूपसे सर्वत्र चिन्तन करनेका प्रकार बताया जाता है—

क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति वृष्टौ । बलमिति विद्युति । यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतमानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे ।

[ सः परमात्मा ]=वह परमात्मा; वाचि=वाणीमें; क्षेमः इति=रक्षाशक्तिके रूपसे है; प्राणापानयोः=प्राण और अपानमें; योगक्षेमः इति=प्राप्ति और रक्षा—दोनों शक्तियोंके रूपमें है; हस्तयोः=हाथोंमें; कर्म इति=कर्म करनेकी शक्तिके रूपमें है; पादयोः=पैरोंमें; गतिः इति=चलनेकी शक्तिके रूपमें स्थित है; पायौ=गुदामें; विमुक्तिः इति=मलत्यागकी शक्ति बनकर है; इति=इस प्रकार (ये); मानुषीः समाज्ञाः=मानुषी समाज्ञा अर्थात् आध्यात्मिक उपासनाएँ हैं; अथ=अब; दैवीः=दैवी उपासनाओंका वर्णन करते हैं; (वह परमात्मा) वृष्टौ=वृष्टिमें; तृप्तिः इति=तृप्ति शक्तिके रूपमें है; विद्युति=बिजलीमें; बलम् इति=बल (पावर) बनकर स्थित है; पशुषु=पशुओंमें; यशः इति=यशके रूपमें स्थित है; नक्षत्रेषु=ग्रहों और