ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 427, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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कुछ भी विभूति, शक्ति और शोभासे युक्त है, वह मेरे ही तेजका एक अंश है (गीता १०।४१)। इन सबको देखकर मनुष्यको सर्वत्र एक परमात्माकी व्यापकताका रहस्य समझना चाहिये।
सम्बन्ध— अब विविध भावनासे की जानेवाली उपासनाका फलसहित वर्णन करते हैं—
तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत। प्रतिष्ठावान् भवति। तन्मह इत्युपासीत। महान् भवति। तन्मन इत्युपासीत। मानवान् भवति। तन्नम इत्युपासीत। नम्यन्तेऽस्मै कामाः। तद् ब्रह्मेत्युपासीत। ब्रह्मवान् भवति। तद् ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत। पर्येणं प्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः। परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः।
तत्=वह (उपास्यदेव); प्रतिष्ठा='प्रतिष्ठा' (सबका आधार) है; इति=इस प्रकार; उपासीत=(उसकी) उपासना करे तो; प्रतिष्ठावान् भवति=साधक प्रतिष्ठावाला हो जाता है; तत्=वह (उपास्यदेव); महः=सबसे महान् है; इति=इस प्रकार समझकर; उपासीत=उपासना करे तो; महान्=महान्; भवति= हो जाता है; तत्=वह (उपास्यदेव); मनः='मन' है; इति=इस प्रकार समझकर; उपासीत=उसकी उपासना करे तो; (ऐसा उपासक) मानवान्=मननशक्तिसे सम्पन्न; भवति=हो जाता है; तत्=वह (उपास्यदेव); नमः='नम' (नमस्कारके योग्य) है; इति=इस प्रकार समझकर; उपासीत=उसकी उपासना करे तो; अस्मै=ऐसे उपासकके लिये; कामाः=समस्त काम—भोग पदार्थ; नम्यन्ते=विनीत हो जाते हैं; तत्=वह (उपास्यदेव); ब्रह्म=ब्रह्म है; इति=इस प्रकार समझकर; उपासीत=उसकी उपासना करे तो; (ऐसा उपासक) ब्रह्मवान्=ब्रह्मसे युक्त; भवति=हो जाता है; तत्=वह (उपास्यदेव); ब्रह्मणः=परमात्माका; परिमरः=सबको मारनेके लिये नियत किया हुआ अधिकारी है; इति=इस प्रकार समझकर; उपासीत=उसकी उपासना करे तो; एनम् परि=ऐसे उपासकके प्रति; द्विषन्तः=द्वेष रखनेवाले; सपत्नाः=शत्रु; प्रियन्ते=मर जाते हैं; ये=जो; परि=(उसका) सब