ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 47, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र १८ ] ईशावास्योपनिषद् ४५
अग्ने = हे अग्निके अधिष्ठातृ देवता!; अस्मान् = हमें; राये = परम धनरूप परमेश्वरकी सेवामें पहुँचानेके लिये; सुपथा = सुन्दर शुभ (उत्तरायण) मार्गसे; नय = (आप) ले चलिये; देव = हे देव; (आप हमारे) विश्वानि = सम्पूर्ण; वयुनानि = कर्मोंको; विद्वान् = जाननेवाले हैं; (अतः) अस्मत् = हमारे; जुहुराणम् = इस मार्गके प्रतिबन्धक; एनः = (जो) पाप हों (उन सबको); युयोधि = (आप) दूर कर दीजिये; ते = आपको; भूयिष्ठाम् = बार-बार; नमउक्तिम् = नमस्कारके वचन; विधेम = (हम) कहते हैं—बार-बार नमस्कार करते हैं॥ १८॥
**व्याख्या—**साधक कहता है—हे अग्निदेवता ! मैं अब अपने परम प्रभु भगवान्की सेवामें पहुँचना और सदाके लिये उन्हींकी सेवामें रहना चाहता हूँ। आप शीघ्र ही मुझे परम सुन्दर मङ्गलमय उत्तरायणमार्गसे भगवान्के परमधाममें पहुँचा दीजिये। आप मेरे कर्मोंको जानते हैं। मैंने जीवनमें भगवान्की भक्ति की है और उनकी कृपासे इस समय भी मैं ध्याननेत्रोंसे उनके दिव्य स्वरूपके दर्शन और उनके नामोंका उच्चारण कर रहा हूँ। तथापि आपके ध्यानमें मेरा कोई ऐसा कर्म शेष हो, जो इस मार्गमें प्रतिबन्धकरूप हो, तो आप कृपा करके उसे नष्ट कर दीजिये। मैं आपको बार-बार विनयपूर्वक नमस्कार करता हूँ*॥ १८॥
यजुर्वेदीय ईशावास्योपनिषद् समाप्त
* इस उपनिषद्का पंद्रहवाँ और सोलहवाँ मन्त्र सबके लिये मननीय है। इन मन्त्रोंके भावके अनुसार सबको भगवान्से दर्शन देनेके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। ‘सत्यधर्माय दृष्टये’ का यह भाव भी समझना चाहिये कि ‘भगवन्! आप अपने स्वरूपका वह आवरण—परदा हटा दीजिये, जिससे सत्यधर्मरूप आप परमेश्वरकी प्राप्ति तथा आपके मङ्गलमय श्रीविग्रहका दर्शन हो सके। इसी प्रकार सत्रहवें और अठारहवें मन्त्रके भावका भी प्रत्येक मनुष्यको विशेषतः मुमूर्षु-अवस्थामें अवश्य स्मरण करना चाहिये।